Chapter 4

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स्थानिक सूचना प्रौद्योगिकी
आप जानते हैं कि कंप्यूटर आंकड़े के प्रक्रमण और आलेख, आरेख तथा मानचित्रों के आलेखन में हमारी सामर्थ में वृद्धि कर देते है। बह विद्याशाखा जो आंकड़ों के प्रबंधन एवं विधियों और कंप्यूटर हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर अनुप्रयोग के संयोजन से चित्रण करने से संबंध रखते हैं, क्रमशः सूचनाधार प्रबंधन तंत्र (Database Management System) और कंप्यूटर-सहायक मानचित्र कला (Computer Assisted Cartography) कहलाते हैं फिर भी ऐसे कंप्यूटर अनुप्रयोग माँँग आंकड़ों के प्रक्रमण और उनके आलेखीय प्रदर्शन तक सीमित रह जाते हैं। अन्य शब्दों में इस प्रकार प्रक्रमित आंकड़ों अथवा इस प्रकार बने मानचित्रों और आरेखों का प्रयोग एक निर्णय पोषक प्रणाली को विकसित करने में नहीं किया जा सकता। वास्तव में हम अपने रोजमर्ग के जीवन में आमतौर पर अनेक प्रश्नों का सामना करते हैं और संतोषजनक समाधानों की तलाश करते हैं। ये प्रश्न हैं- कोई वस्तु कहाँ पर है? बह वहाँ क्यों है? क्या होगा यदि इसे नयी अवस्थिति पर स्थानांतरित कर दिया जाए? इस पुनर्नियतन से कौन लाभान्वित होगा? यदि यह पुनर्नियतन होता है तो किन लोगों के लाभ छूटने की अपेक्षा है? इन और अन्य अनेक प्रश्नों को समझने के लिए हमें विभिन्न स्वोतों से एकत्रित आवश्यक आंकड़ों के प्रगहण और कंप्यूटर, जो कि भौगोलिक प्रक्रमण, यंत्रों से सुसज्जित हैं, का प्रयोग करके उन्हें समन्चित करने की जरुरत है। इसी में स्थानिक सूचना तंत्र की संकल्पना निहित हैं। इस अध्याय में हम स्थानिक सूचना प्रौद्योगिकी के आधारभूत सिद्धांतों और स्थानिक सूचना तंत्र तक इसके विस्तार जिसे प्रायः भौगोलिक सूचना तंत्र कहा जाता है, की चर्चा करेंगे।
स्थानिक सूचना प्रौद्योगिकी क्या है?
शब्द स्थानिक की व्युत्पत्ति स्थान से हुई है। इसका तात्पर्य भौगोलिक रूप से परिभाषित क्षेत्र जिसके भौतिक रूप से माप योग्य आयाम हैं, पर लक्षणों और परिघटनाओं के वितरण से है।
हम जानते हैं कि अधिकांश ऑँकडों, जिनका आज हम प्रयोग करते हैं, वे स्थानिक घटक (अवस्थिति) होते हैं, जैसे कि किसी नगरपालिका का पता अथवा कृषि जोत की सीमाएँ इत्यादि। इस प्रकार स्थानिक सूचना प्रौद्योगिकी का संबंध स्थानिक सूचना के संग्रहण, भंडारण, पुनप्राप्ति, प्रदर्शन, हेरफेर, प्रबंधन और विश्लेषण में प्रौद्योगिक निवेश के प्रयोग से है। यह सुदूर-संवेदन, वैश्विक स्थिति-निर्धारण तंत्र (GPS), भौगोलिक सूचना तंत्र (GIS), आंकिक मानचित्र कला और सूचनाधार प्रबंध प्रणालियों का एक सम्मश्रण है।
भौगोलिक सूचना तंत्र (GIS) क्या है?
1970 के दशक के मध्य से उपलब्ध अग्रवर्ती अभिकलन प्रणालियाँ स्थानिक आंकड़ों एवं गुण न्यास और उनके संबंध के उद्देश्य के लिए भू-संदर्भित सूचना के प्रकमण, व्यक्तिगत फाइलों में विशिष्ट सूचना का स्थिति निर्धारण, अभिकलनों का क्रियान्वयन तथा निर्णय पोषित प्रणालियों को विकसित करने का सामर्थ्य प्रदान करती है। इन सभी क्रियाओं को करने में समर्थ तंत्र को भौगोलिक सूचना तंत्र ( GIS ) कहा जाता है। इसे स्थानिक दृष्टि से पृथ्वी से संदर्भित आंकड़ों के प्रग्रहण, भंडारण, जाँच, समन्वय, हेरफेर, विश्लेषण और प्रदर्शन के तंत्र रूप में परिभाषित किया जाता है। इसमें स्थानिक दृष्टि से संदर्भित कंप्यूटर सूचनाधार और उपयुक्त अनुप्रयोग सॉफ्टवेयर सम्मिलित समझे जाते हैं, यह कंप्यूटर सहायक मानचित्र कला और सूचनाधारित प्रबंधन तंत्र का सम्मिश्रण है जो स्थानिक और समवर्गी विज्ञानों जैसे कंप्यूटर विज्ञान, सांख्यिकी, मानचित्र कला, सुदूर-संवेदन सूचनाधार प्रौद्योगिकी, भूगोल, भू-विज्ञान, जल विज्ञान, कृषि, संसाधन प्रबंध, पर्यावरणीय विज्ञान और लोक प्रशासन से संकल्पनात्मक और रीति विधान संबंधी बल प्राप्त करता है।
भौगोलिक सूचना के प्रकार
दो प्रकार के आंकड़े भौगोलिक सूचना प्रदान करते हैं- स्थानिक आंकड़े एवं गैर स्थानिक आंकड़े (बॉक्स 4.1)। स्थानिक आंकड़ों को उनकी स्थिति, रेखा, क्षेत्रीय रूप एवं बनावट के आधार पर विश्लेषित किया जाता है।
| साइकिल की दुकान का स्टॉक रजिस्टर | 1981 में राज्यों की साक्षर जनसंख्या | ||||
| पार्ट संख्या | मात्रा | विवरण | राज्य | % पुरुष | % स्त्री |
| 101435 | 54 | चक्रार | केरल | 75.3 | 65.7 |
| 108943 | 68 | बाल बियरिंग | महाराष्ट्र | 58.8 | 34.8 |
| 105956 | 25 | पहिए का रिम | गुजरात | 54.4 | 32.3 |
| 123545 | 108 | टायर | पंजाब | 47.2 | 33.7 |
भौगोलिक सूचनाधार : एक सूचनाधार में गुण और उनकी मदें अथवा वर्ग होते हैं। बाई ओर गैर-स्थानिक आंकड़े साइकिल के पुर्जे प्रदर्शित करते हैं, जो कहीं भी अवस्थित हो सकते हैं। दाई ओर दर्ज आंकड़े स्थानिक हैं क्योंकि विभिन्न राज्यों के नामों की, जो अनेक गुणों में से एक है, मानचित्र पर अपनी एक निश्चित अवस्थिति है। इन आंकड़ों को भौगोलिक सूचना तंत्र में प्रयोग किया जा सकता है।

आंकड़ों के ये रूप आमतौर पर मान्य और समुचित रूप से परिभाषित निर्देशांक प्रणाली से ज्यामितीय रूप से पंजीकृत हो और कोडित हो ताकि उनका भौगोलिक सूचना तंत्र के आंतरिक सूचनाधार संरचना में भंडारण किया जा सके। दूसरी ओर जो आंकड़े स्थानिक आंकड़ों का वर्णन करते हैं, गैर-स्थानिक अथवा गुण न्यास कहलाते है। स्थानिक अथवा भौगोलिक सूचना तंत्र में सर्वाधिक महत्वपूर्ण पूर्व-आवश्यक वस्तु स्थानिक आंकड़े है। भौगोलिक सूचना तंत्र के क्रोड में इन्हें अनेक विधियों से बनाया जा सकता है। वे हैं :
भौगोलिक सूचना तंत्र के लिए भौगोलिक आंकड़ों के स्त्रोत का चयन बृहत् रूप से निम्नलिखित द्वारा निर्धारित होता है :
आंकड़ों की संरचना का प्रकार, अर्थात् सदिश (वेक्टर)/चित्ररेखापुँज (रैस्टर) अनेक प्रयोक्ताओं के लिए स्थानिक आंकड़ों का सर्वाधिक साधारण स्ठोत कठोर कॉपी (कागज्ञ) अथवा मृदु कॉपी (आंकिक) स्थलाकृतिक अथवा विषयक मानचित्र हैं। इन सभी मानचित्रों की विशेषताएँ होती हैं :
हस्तेन विधियों की तुलना में भौगोलिक सूचना तंत्र के लाभ
भौगोलिक सूचना के ग्राफ़ी संचार माध्यम और ज्यामितीय संलगनता रखने के बावजूद मानचित्र में कुछ निम्नलिखित वशांगत सीमाएँ होती हैं :
भौगोलिक सूचना तंत्र के घटक
भौगोलिक सूचना तंत्र के महत्वपूर्ण घटकों में निम्नलिखित सम्मिलित हैं :
भौगोलिक सूचनातंत्र के विभिन्न घटकों को चित्र 4.2 में दर्शाया गया है।
हार्डवेयर
जैसा कि अध्याय 4 में चर्चा की गई है, भौगोलिक सूचनातंत्र के प्रमुख घटक तीन हैं :
सॉफ्टवेयर
एक अनुप्रयोग सॉफ्टवेयर के साथ निम्नलिखित संक्रियात्मक माड्यूल्स भौगोलिक सूचना तंत्र की महत्वपूर्ण पूर्व-आवश्यकता है :
आंकड़े
स्थानिक आंकड़े और संबंधित तालिका रूपी आंकड़े भौगोलिक सूचनातंत्र की रोढ़ हैं। वर्तमान आंकड़ों को आपूर्तिदाता से प्रग्रहित किया जा सकता है अथवा प्रयोक्ता द्वारा नए आंकड़ों का सृजन/संग्रहण वहीं के वहीं (in-house) किया जा सकता है। आंकिक मानचित्र भौगोलिक सूचनातंत्र के आधारभूत आंकड़ा निवेश की रचना करता है। मानचित्रीय वस्तुओं से संबंधित तालिका रूपी आंकड़ों को भी आंकिक आंकड़ों के साथ संलग्न किया जा सकता है। एक भौगोलिक सूचना तंत्र स्थानिक आंकड़ों को आंकड़ों के अन्य स्त्रोतों से
समन्वित करता है और यहाँ तक कि सूचना आधार प्रबंधन प्रणाली (DBMS) का भी प्रयोग करता है।
प्रक्रिया
प्रक्रिया में आंकड़ों का प्रत्यानयन, तन्त्र में निवेश, संचय, प्रबंध, रूपांतरण, विश्लेषण और अंत में तन्त्र में बहिर्वेश सम्मिलित है।

लोग
भौगोलिक सूचनातंत्र के प्रयोक्ताओं का परिसर हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर अभियंताओं से लेकर संसाधन एवं पर्यावरणीय वैज्ञानिकों, नीति-निर्माताओं और मॉनीटरिंग एवं क्रियान्वयन अभिकरणों तक अत्यधिक विस्तृत है। ये वर्गगत लोग भौगोलिक सूचना तंत्र का प्रयोग निर्णय पोषित प्रणाली को विकसित करने और वास्तविक काल पर उत्पन्न होने वाली समस्याओं के समाधान हेतु करते हैं।
स्थानिक आंकड़ा फॉर्मेंट
स्थानिक आंकड़ों का प्रदर्शन चित्ररेखापुँज (रैस्टर) और सदिश (वैक्टर) फार्मेंटों द्वारा होता है :
चित्ररेखापुँज (रैस्टर) आंकड़ा फॉर्मेंट
चित्रलेखापुँज (रैस्टर) आंकड़े वर्गों के जाल के प्रारूप में आंकड़ों का ग्राफी प्रदर्शन करते हैं जबकि सदिश

(वेक्टर) आंकड़े वस्तु का प्रदर्शन विशिष्ट बिंदुओं के बीच खींची गई रेखाओं के समुच्चय के रूप में करते हैं। कागज़ के एक पुर्जे पर तिरछी खींची गई एक रेखा का विचार कीजिए। एक चित्रलेखापुँज (रैस्टर) फाइल इस प्रतिबिंब का प्रदर्शन कागज़ को उपविभाजित करके छोटी आयतों के आधूह जिन्हें सेल कहा जाता है, के रूप में करेगी – बिल्कुल एक ग्राफ्र पेपर की शीट की तरह आंकड़ा फाइल में प्रत्येक सेल को एक स्थान प्रदान किया जाता है और उस स्थान के गुण के आधार पर एक मूल्य दिया जाता है इसकी पंक्तियों और स्तंभों के निर्देशांक किसी भी व्यक्तिगत पिक्सेल (Pixel) की पहचान कर सकते हैं। आंकड़ों का यह प्रदर्शन प्रयोक्ता को प्रतिबिंब के पुनर्गठन अथवा दृश्यांकन में सहायता करता है।

सेलों के आकार और उनकी संख्या के बीच संबंध को चित्ररेखापुँज (रैस्टर) के विभेदन के रूप में अभिव्यक्त किया जाता है। चित्र 4.4 में रैस्टर फॉर्मेट में आंकड़ों पर के आकार के प्रभाव को स्पष्ट किया गया है।
चित्ररेखापुँज (रैस्टर) फाइल फॉर्मेंटों का अधिकतर प्रयोग प्रायः निम्नलिखित क्रियाओं के लिए किया जाता है :
सदिश ( वेक्टर ) आंकड़ा फॉमेंट
उसी तिरछी रेखा का सदिश (वेक्टर) प्रदर्शन केवल निर्देशांकों के आरंभिक एवं अंतिम बिंदुओं को दर्ज़ कर रेखा की स्थिति को दर्ज करके होगा। प्रत्येक बिंदु की अभिव्यक्ति दो अथवा तीन संख्याओं के रूप में होगी। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि प्रदर्शन द्वि-आयामी (2D) था अथवा त्रि-आयामी (3D), जिसे प्रायः X,Y अथवा X,Y,Z निर्देशांकों द्वारा निर्दिष्टि किया जाता है (चित्र 4.5)। पहली संख्या X, बिंदु और कागज्ञ की बाई सीमा के बीच की दूरी है; Y बिंदु तथा कागज्ञ की निचली सीमा के बीच दूरी; Z कागज्ञ के ऊपर अथवा नीचे से बिंदु की उच्चता है। मापे गए बिंदुओं को मिलाने से सदिश (वेक्टर) का निर्माण होता है।

एक सदिश (वेक्टर) आंकड़ा मॉडल अपने यथार्थ (पृथवी) निर्देशांकों द्वारा भंडारित बिंदुओं का प्रयोग करता है। यहाँ रेखाओं और क्षेत्रों का निर्माण बिंदुओं के अनुक्रम द्वारा होता है। रेखाओं की दिशा बिंदुओं के क्रमण के अनुरूप होती है। बहुभुजों का निर्माण बिंदुओं अथवा रेखाओं द्वारा होता है। सदिश (वेक्टर) संस्थिति के बारे में सूचना का भंडारण कर सकता है। सदिश (वेक्टर) आंकड़ों के निवेश के लिए हस्तेन अंकीकरण सर्वोतम विधि है।
सदिश (वेक्टर) फाइलों का प्रयोग अधिकतर प्रायः निम्नलिखित के लिए किया जाता है :
| चित्ररेखापुँज ( रैस्टर ) माँडल | सदिश ( वेक्टर ) माँडल |
| चित्ररेखापुँज ( रैस्टर ) माँडल● आंकड़ा संरचना सरल● अधिचित्रण सरल और दक्ष● सुदूर संवेदन प्रतिबिंबों के साथ संगत● उच्च स्थानिक विचरणशीलता का दक्षप्रतिनिधित्व।● स्वयं की प्रोग्रामिंग हेतु सरल● अनेक गुणों के लिए वही प्रिड सेल | सदिश ( वेक्टर ) माँडल● संहत आंकड़ा संरचना● परिपथ जाल विश्लेषण के लिए दक्ष● प्रक्षेपण रूपांतरण में दक्ष● परिशुढ़ मानचित्र बहिवेश |
| हानि● कंष्यूटर भंडारण का अदक्ष प्रयोग● परिमाप और आकृति में त्रुटियाँ● परिपथ जाल का विश्लेषण कठिन● प्रक्षेपण का रूपांतरण अदक्षबृहद् सेलों का प्रयोग करते समय सूचनाका हास। कम परिशुढ़ मानचित्र(यद्यपि अन्योन्यक्रियात्मक) | हानि● आंकड़ा संरचना जटिल● अधिचित्रण के कठिन प्रचालन● उच्च स्थानिक विचरणशीलता का अदक्षप्रतिनिधित्व।● सुदूर संवेदन प्रतिबिंबों के साथ असंगत। |
| चित्ररेखापुँज(रैस्टर) सत्ताएँ | यथार्थ विश्व कीसत्ताएँ | सदिश (वेक्टर)सत्ताएँ |
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![]() | पूर्ति | Y![]() |
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बॉक्स 4.2 में चित्ररेखापुँज (रैस्टर) और सदिश (वेक्टर) आंकड़ा फॉर्मटों के लाभों और अवगुणों (हानियों) को स्पष्ट किया गया है।
भौगोलिक सूचनातंत्र की क्रियाओं का अनुक्रम
भौगोलिक सूचना तंत्र से संबंधित काम में क्रियाओं का निम्नलिखित अनुक्रम सम्पिलित होता है :
स्थानिक आंकड़ा निवेश
जैसा कि पहले उल्लेख किया जा चुका है कि भौगोलिक सूचना तंत्र में स्थानिक सूचनाधार की रचना भिन्न-भिन्न स्त्रोतों से हो सकती है। इन्हें निम्नलिखित दो वर्गों में संक्षेपित किया जा सकता है :
आंकड़ा आपूर्तिदाता से आंकिक आंकड़ा समुच्चय का प्रगहण
वर्तमान में आंकड़ा आपूर्तिदाता आंकिक आंकड़ों को तैयार रूप में उपलब्थ कराते हैं, जो लघु-मापनी मानचित्रों से लेकर बृहत् मापनी प्लान तक होते हैं। अनेक स्थानीय सरकारों और निजी कंपनियों के लिए ऐसे आंकड़े प्रारंभिक स्ठोत की रचना करते हैं और प्रयोक्ताओं के ऐसे समूहों को आंकड़ों के अंकीकरण और स्वयं संग्रहण के उपरिव्यय से मुक्त रखते हैं। यद्यपि ऐसे विद्यमान आंकड़ा समुच्चयों का प्रयोग आकर्षक और समय की बचत करने वाला होता है परंतु जब आंकड़ों को विभिन्न स्ठोतों/आपूर्तिदाताओं से प्राप्त कर किसी एक परियोजना में संयोजित करते हैं तो आंकड़ों की संगतता पर गंभीरतापूर्वक ध्यान देना चाहिए। प्रक्षेप, मापनी, आधार तल और गुणों के वर्णन के संबंध में अंतर समस्याएँ पैदा कर सकते हैं।
क्रियात्मक स्तर पर यह सुनिश्चित करने के लिए कि आंकड़े अपने अनुप्रयोग के साथ संगत हैं, प्रयोक्ता को उनकी निम्नलिखित विशेषताओं का ध्यान रखना चाहिए।
इसका भी जरूर ध्यान दिया जाना चाहिए जहाँ आंकड़ों का प्रयोग अनेक स्त्रोतों से किया जाता है, और विशेष रूप से जहाँ अध्ययन क्षेत्र प्रशासकीय सीमाओं को लाँघता है, वहाँ भिन्न-भिन्न भौगोलिक संदर्भ प्रणालियों, आंकड़ों के वर्गीकरण और निर्दर्शन तथा व्यक्तिगत सर्वेक्षणों की सामरिकी के कारण आंकड़ों के समन्वय में कठिनाई आती है। अतः प्रयोक्ता को इन समस्याओं के प्रति सजग होने की आवश्यकता है जो अंतर-राज्यीय और अंतर-जिला आंकड़ा समुच्चयों के संकलन के दौरान विशेष रूप से उत्पन्न होती हैं। एक बार आंकड़ा विभिन्न आपूर्ति-दाताओं से प्रग्रहित आंकड़ों में संगतता स्थापित हो जाती है तो अगला चरण एक स्थानांतरण के माध्यम से भौगोलिक सूचना तंत्र को आंकड़ों का स्थानांतरण है। इस उद्देश्य के लिए DAT टेपों, CD ROMS और प्लॉपी डिस्क का प्रयोग तेजी से आम होता जा रहा है। इस अवस्था में स्त्रोत की कोडन और संरचना करने वाली प्रणाली का भौगोलिक सूचना तंत्र की प्रयोग की जाने वाली प्रणाली में परिवर्तन महत्वपूर्ण है। हस्तेन निवेश द्वारा आंकिक आंकड़ा समुच्चयों की रचना
भौगोलिक सूचना तंत्र में आंकड़ों के हस्तेन निवेश की चार मुख्य अवस्थाएँ होती हैं :
आंकड़ा निवेश की हस्तेन विधियाँ इस बात पर निर्भर करती हैं कि क्या सूचनाधार की संस्थिति सदिश (वेक्टर) है अथवा जाल सेल (चित्ररेखापुँजीय) वाली। भौगोलिक सूचना तंत्र में स्थानिक आंकड़ों के निवेश की सर्वाधिक साधारण विधियाँ इनके माध्यम से हैं :
सत्ता मॉडल में भौगोलिक आंकड़े बिंदु, रेखाएँ और/अथवा बहुभुज (क्षेत्र)/पिक्सेल के रूप में होते हैं जिन्हें निर्देशांकों की शृंखला का प्रयोग कर परिभाषित किया जाता है। इन्हें मानचित्र अथवा वायव फ्रोटोग्राफ के भौगोलिक संदर्भ तंत्र का उल्लेख करके अथवा इसमें जाल अथवा वर्ग का अधिचित्रण करके प्राप्त किया जा सकता है। अंककों व क्रमवीक्षकों के प्रयोग से निर्देशांकों को लिखने वाले समय और श्रम में बहुत ज्यादा कमी आ जाती है। हम यहाँ संक्षेप में चर्चा करेंगे कि क्रमवीक्षक का प्रयोग करके भौगोलिक सूचना तंत्र के क्रोड में स्थानिक आंकड़ों की रचना किस प्रकार की जाती है।
क्रमवीक्षक
क्रमवीक्षक वे साधन हैं जो समरूप आंकड़ों को आंकिक जाल-आधारित प्रतिबिंबों में परिवर्तित करते हैं। इनका प्रयोग एक रेखा मानचित्र को उच्च विभेदन चित्ररेखापुँज (रैस्टर) प्रतिबिंबों में परिवर्तित करने के लिए स्थानिक आंकड़ों के परिग्रहण में प्रयोग किया जाता है। इन चित्ररेखापुँज (रैस्टर) प्रतिबिंबों का प्रयोग प्रत्यक्ष रूप से अथवा इन्हें आगे संसाधिक करके सदिश (वेक्टर) संस्थिति प्राप्त करने में किया जाता है। क्रमवीक्षकों के दो आधारभूत प्रकार होते हैं। वे हैं :
पहले प्रकार के क्रमवीक्षणों में एक चल भुजा पर स्थित प्रदीप्ति का स्तोत (प्रायः प्रकाश उत्सर्जक डायोड अथवा एक स्थायीकृत प्रतिदीप्ति लैंप) और एक उच्च विभेदक लैंप सहित आंकिक कैमरे का समावेश होता है। कैमरा प्रायः एक सरणी में व्यवस्थित विशेष संवेदकों, जिन्हें आवेशित युग्मित साधन (CCDs) कहा जाता है, ये अर्धचालक साधन होते हैं जो अपनी सतह पर पड़ते प्रकाश के कॉटोनों को इलैक्ट्रांस के समूह में स्थानांतरित कर देते हैं जिन्हें बाद में आंकिक मद के रूप में दर्ज़ किया जाता है।
मानचित्र पर किसी भी क्रमवीक्षक का संचलन मानचित्र के दो-आयामी ऑंकिक प्रतिबिंब का निर्माण करता है। क्रमवीक्षित किए जाने वाले मानचित्र को चपटे तल पर अथवा घूमते हुए ड्रम पर आरोपित किया जाता है। चपटे तल वाले क्रमवीक्षकों में प्रकाश के स्थोत को दस्तावेज्त के ऊपर एक व्यवस्थित ढंग से ऊपर और नीचे घुमाया जाता है। बड़े मानचित्रों के लिए ऐसे क्रमवीक्षक प्रयोग में लाए जाते हैं जो एक स्टैंड पर आरोपित होते हैं और प्रदीप्ति स्थोत व कैमरा सरणी एक ही जगह पर स्थिर कर दिए जाते हैं। एक अशन साधन द्वारा मानचित्र को पीछे से घुमाया जाता है आधुनिक दस्तावेज्त क्रमवीक्षक प्रतिलोम में लेसर प्रिंटर से मिलते जुलते हैं क्योंकि क्रमवीक्षित सतह प्रकाश संवेदक स्थानों के वियोजन से निर्मित होती है जिसका प्रत्यक्ष संबंध सॉफ्टवेयर से होता है। चल प्रकाश स्थोत के अतिरिक्त कोई भी गतिमान पुर्जा नहीं होता। वियोजन का निर्धारण यांत्रिक भुजा की अपेक्षा संवेदक सतह की ज्यामिती और स्मृति की मात्रा द्वारा होता है।
सर्वश्रेष्ठ संभव क्रमवीक्षकों के बावजूद भी क्रमवीक्षित प्रतिबिंब हमेशा अशुद्ध होता है क्योंकि इसमें मूल मानचित्र के सभी धब्बे और दोष अंतर्विष्ट होते हैं। इसलिए, इसे उपयोज्य बनाने के लिए आंकिक प्रतिबिंब में से बाहुल्य आंकड़ों को हटा देना चाहिए।
गुण न्यास की प्रविष्टि
मूल न्यास स्थानिक सत्ता की विशेषताओं, जिनका निपटान भौगोलिक सूचना वर्णन करता है। उदाहरण के तौर पर एक सड़क का प्रग्रहण संस्पर्शी पिक्सेल्स के समुच्चय के रूप में अथवा एक रेखा सत्ता के रूप में होता है और जिसका प्रतिनिधित्व भौगोलिक सूचना तंत्र के स्थानिक भाग में एक विशेष रंग, चिह्न या आंकड़ा अवस्थित द्वारा होता है। सड़क के प्रकार का वर्णन करती सूचना को मानचित्रात्मक चिह्नों के परास में समाविष्ट किया जा सकता है। सड़क से संबंधित गुणात्मक मूल्यों, जैसे कि सड़क की चौढ़डाई, धरातल का प्रकार, यातायात की अनुमानिक संख्या और विशिष्ट यातायात नियमन, का या तो संबंध परक सूचनाओं की दशा में भौगोलिक सूचना तंत्र की एक स्थानिक सूचना के रूप में अथवा पदार्थ परक सूचनाधारों की दशा में स्थानिक विवरण सहित निवेश के रूप में अलग-अलग भंडारण किया जा सकता है।
प्रकाशित रिकाडों, सरकारी जनगणनाओं, प्राथमिक सर्वेक्षणों अथवा स्प्रैड शीटों जैसे स्त्रोतों से उपर्जित गुण न्यास को GIS सूचनाधार में या तो हस्तेन अथवा मानक स्थानांतरण फॉर्मेंट का प्रयोग करते हुए आंकड़ों का आयात करके निवेश किया जाता है।
आंकड़ों का सत्यापन और संपादन
आंकड़ों की शुद्धता को सुनिश्चित करने हेतु त्रुटियों की पहचान और संशोधन के लिए भौगोलिक सूचना तंत्र में प्रग्रहित आंकड़ों को सत्यापन की आवश्यकता होती है। अंकीकरण के दौरान उत्पन्न हुई त्रुटियों में आंकड़ों का लोपन और नीचे-ऊपर छवि अंकन शामिल हो सकते है। स्थानिक आंकड़ों में त्रुटियों की जॉँच करने का सर्वोंत्तम तरीका कंप्यूटर का आलेख बनाना अथवा मूल जैसी मापनी पर पारभासी कागज्ञ को अधिमान देते हुए आंकड़ों का मुद्रण लेना है। दोनों मानचित्रों को प्रकाशीय मेज्ञ पर एक-दूसरे के ऊपर रखकर मानचित्र पर बाएँ से दाएँ तथा ऊपर से नीचे क्रमबढ़ तरीके से काम करते हुए आरेखों से देखकर उनकी तुलना की जा सकती है। अप्राप्त आंकड़ों और स्थितिजन्य त्रुटियों को प्रिट आउट पर स्पष्ट रूप से चिहित कर देना चाहिए। स्थानिक और गुण न्यास के प्रग्रहण के दौरान उत्पन्न होने बाली त्रुटियों को नीचे दिए गए प्रकार से वर्गीकृत किया जाना चाहिए :
स्थानिक आंकड़े अपूर्ण अथवा दोहरे हैं
स्थानिक आंकड़ों में अपूर्णता बिंदुओं, रेखाओं अथवा बहुभुज/क्षेत्र के हस्तेन प्रविष्ट आंकड़ों के विलोपन से उत्पन्न होती है। क्रमवीक्षित आंकड़ों में विलोपन प्रायः रेखाओं के मध्य अंतर के रूप में होता है जहाँँ रैक्टर-सदिश (वेक्टर) परिवर्तन प्रक्रिया एक रेखा के सभी भागों को जोड़ने में असफल हो जाती है।
स्थानिक आंकड़े गलत मापनी पर
गलत मापनी पर अंकीकरण, गलत मापनी पर निवेशी स्थानिक आंकड़ों को जन्म देता है। क्रमवीक्षित आंकड़ों में समस्याएँ प्रायः तब उत्पन्न होती हैं जब भौगोलिक संदर्भ प्रक्रिया के दौरान अशुढ़ मदों का प्रयोग किया जाता है।
स्थानिक आंकड़े विस्पित हैं
स्थानिक आंकड़े विरूपित भी हो सकते हैं यदि अंकीकरण के लिए प्रयुक्त आधारी मानचित्रों की मापनी शुढ़ नहीं है। वायव फ्रोटोग्राफ्रों में, विशेष रूप से, लैंस के विरूपण, स्थल और झुकाव के विस्थापन से मापनी अशुढ़ हो जाती है। इसके अतिरिक्त क्रमवीक्षण और अंकीकरण के लिए प्रयुक्त कागजी मानचित्रों और क्षेत्र प्रलेखों में वर्षा व धूप में उनके अनावरण और बार-बार मुड़ने के परिणामस्वरूप यादृच्छिक विरूपण आ सकते हैं। यदि सूचनाधार का निर्देशांक तंत्र निवेशी प्रलेख अथवा प्रतिबिंब में प्रयुक्त निर्देशांक तंत्र से भिन्न है तो एक निर्देशांक तंत्र का दूसरे में परिवर्तन आवश्यक हो जाता है।
संपादन और संवर्धन क्रियाओं के माध्यम से इन त्रुटियों में संशोधन की आवश्यकता का अधिकांश भौगोलिक सूचना तंत्र प्रक्रिया सामग्री समर्थन करते हैं। यह प्रक्रिया समय खर्चीली और अन्योन्यक्रियात्मक है जो आंकड़ों के निवेश की तुलना में अधिक समय हो सकती है। आंकड़ों का संपादन प्रायः त्रुटियों से युक्त मानचित्र के भाग को कंप्यूटर की स्क्रीन पर देखकर और सॉफ्टवेयर के माध्यम से कुँजीपटल, माउस द्वारा निर्यत्रित स्क्रीन प्रसंकेतक अथवा छोटे अंकक, टेबलेट का प्रयोग करते हुए उनका संशोधन करके किया जाता है।
सदिश (वेक्टर) सूचनाधार में स्थितिजन्य लघु त्रुटियों का संशोधन स्क्रीन प्रसंकेतक द्वारा स्थानिक सत्ताओं को हिला कर किया जा सकता है। कुछ भौगोलिक सूचना तंत्र में कंप्यूटर निर्देशों का प्रत्यक्ष प्रयोग करते हुए ग्राफ़ी सत्ताओं को आवश्यकता अनुसार हिलाया, घुमाया, मिटाया, प्रविष्ट कराया, फैलाया अथवा रूंडित किया जाता है। जहाँ अतिरिक्त निर्देशांक एक रेखा को परिभाषित करते हैं, उन्हें वीडिंग एल्लोरिथ्म द्वारा हटाया जा सकता है। चित्ररेखापुँज (रैस्टर) आंकड़ों में गुणात्मक मदों और स्थानिक त्रुटियों को दोषपूर्ण सैलों की मदों में परिवर्तन करके संशोधित किया जा सकता है। एक बार स्थानिक त्रुटियों के संशोधित हो जाने के बाद सदिश (वेक्टर) रेखा और बहुभुज परिपथजाल की संस्थिति का जनन किया जा सकता है।
आंकड़ा परिवर्तन
आंकड़ों की हेरफेर और विश्लेषण करते हुए सभी आंकड़ों के लिए एक जैसे फार्मेट का प्रयोग करना चाहिए। जब एक ही समय में विभिन्न स्तरों का प्रयोग किया जाना हो वे सभी या तो सदिश (वेक्टर) अथवा सभी चित्ररेखापुँज (रैस्टर) फॉर्मेट में होने चाहिए। प्रायः परिवर्तन सदिश (वेक्टर) से चित्ररेखापुँज (रैस्टर) में होता है क्योंकि विश्लेषण का सबसे बड़ा भाग चित्ररेखापुँज (रैस्टर) परिमंडल में होता है। सदिश (वेक्टर) आंकड़ों का चित्ररेखापुँज (रैस्टर) आंकड़ों में परिवर्तन प्रयोक्ता परिभाषिक सेल आकार के साथ वर्ग (ग्रिड) के अधिचित्रण से होता है।
कई बार चित्ररेखापुँज (रैस्टर) फॉर्मेंट के आंकड़ों को सदिश (वेक्टर) फॉर्मेंट के आंकड़ों में परिवर्तित किया जाता है। ऐसी स्थिति तब आती है जब कोई, सदिश (वेक्टर) आंकड़ों की तुलना में चित्ररेखापुँज (रैस्टर) आंकड़ों के भंडारण स्थान की अधिक जरूरत होने पर, आंकड़ों का लघुकरण करना चाहिए।
भौगोलिक आंकड़े : सहलगनता और सुमेलन
भौगोलिक सूचना तंत्र में स्थानिक और गुण न्यास की सहलग्नता महत्वपूर्ण है। इसलिए इसे सावधानीपूर्वक करना चाहिए। गुण न्यास को असंबढ़ स्थानिक आंकड़ों से सहलग्न करने पर परम आंकड़ा विश्लेषण से अस्त-व्यस्तता उत्पन्न हो जाएगी। इसी प्रकार आंकड़ों के एक स्तर का दूसरे से सुमेलन भी सार्थक है।
सहलग्नता
एक भौगोलिक सूचना तंत्र विशिष्ट रूप से विभिन्न आंकड़ा समुच्यों को जोड़ता है। कल्पना कीजिए कि हम किसी राज्य में 10 वर्ष से कम आयु के बच्चों में कुपोषण के कारण मृत्युदर को ज्ञात करना चाहते है। यदि हमारे पास एक फाइल है जिसमें इस आयु वर्ग के बच्चों की संख्या है और दूसरी फाइल में कुपोषण से मृत्युदर दी गई है, सबसे पहले हमें दो आंकड़ा फाइलों को जोड़ना पड़ेगा। एक बार ऐसा हो जाने पर, हम एक संख्या को दूसरी से भाग देकर वांछनीय उत्तर प्राप्त कर सकते हैं।
यथार्थ सुमेलन
यथार्थ सुमेलन का अर्थ है कि यदि हमारे पास कंप्यूटर फाइल में अनेक भौगोलिक लक्षणों (उदाहरणतः कस्बे) की सूचना है तथा उन्हीं लक्षण समुच्चय के बारे में अतिरिक्त सूचना किसी और फाइल में है। दोनों फाइलों की समान कृँजी, अर्थात् कस्बों के नाम का प्रयोग करते हुए हम दोनों को एक जगह लाने का प्रचालन आसानी से कर सकते हैं। इस प्रकार एक जैसे नाम वाले कस्बे की प्रत्येक फाइल में से रिकार्ड को निकाल लिया जाता है और दोनों को जोड़कर किसी अन्य फाइल में संचयित कर लिया जाता है।
पदानुक्रमिक सुमेलन
कुछ प्रकार की सूचनाओं को, यद्यपि, अन्य प्रकार की सूचनाओं की अपेक्षा अधिक विस्तारपूर्वक किंतु कम बार एकत्रित किया जाता है। उदाहरण के तौर पर विस्तृत क्षेत्रों पर भूमि उपयोग संबंधी आंकड़ों को बारंबार एकत्रित किया जाता है। दूसरी और भूमि रूपांतरण के आंकड़ों को छोटे क्षेत्रों मगर कभी कभार अंतरालों पर एकत्रित किया जाता है। यदि अपेक्षाकृत छोटे क्षेत्र बड़े क्षेत्रों में सर्मजित हो जाते हैं तब उसी क्षेत्र के आंकड़ों के सुमेलन का तरीका पदानुक्रमित सुमेलन है। छोटे क्षेत्रों के आंकड़ों को तब तक इकट्टा जोड़े जब तक समृहित क्षेत्र बड़े क्षेत्रों से सुमेलित न हो जाएँ और तब यथार्थतापूर्वक सुमेलित कीजिए।
अस्पष्ट सुमेलन
कई अवसरों पर अपेक्षाकृत छोटे क्षेत्रों की सीमाएँ बड़े क्षेत्रों से मेल नहीं खाती। समस्या तब ज्यादा पैदा होती है जब पर्यावरणीय आंकड़े अंत्गर्स्त हों। उदाहरण के तौर पर फसली सीमाएँ जो प्रायः खेतों के किनारों/सीमाओं द्वारा परिभाषित होती हैं दुर्लभता से मृदा प्रकारों की सीमाओं से मेल खाती हैं। यदि किसी विशिष्ट फसल के लिए हम सर्वांधिक उपजाऊ मृदा का निर्धारण करना चाहें तो हमें दो समुच्चयों का अधिचित्रण करना होगा और प्रत्येक मृदा प्रकार की शस्य उत्पादकता का अभिकलन करना होगा।
एक भौगोलिक सूचना तंत्र इन सभी प्रचालनों को कार्यान्वित कर सकता है। यद्यपि, स्थानिक सूचना के समुच्चयों को तभी जोड़ा जाता है जब वे एक भौगोलिक क्षेत्र से संबढ़ हों।
स्थानिक विश्लेषण
भौगोलिक सूचना तंत्र की प्रबलता उसकी विश्लेषणात्मक सामर्थ में निहित है। जो चीज भौगोलिक सूचना तंत्र को अन्य सूचना तंत्रों से अलग करती है वह है इसकी स्थानिक विश्लेषण की क्रियाएँ। विश्लेषण क्रियाएँ यथार्थ विश्व से संबंधित प्रश्नों के उत्तर देने के लिए सूचनाधार में स्थानिक और गैर-स्थानिक गुणों का प्रयोग करती है। भौगोलिक विश्लेषण माँडलों के विकास और अनुप्रयोग से यथार्थ विश्व प्रक्रियाओं के अध्ययन को सुगम बनाता है। ऐसे माँडल भौगोलिक आंकड़ों में अध्यशायी प्रवृत्तियों को उजागर करके नयी संभावनाओं को प्रस्तुत करते है। भौगोलिक विश्लेषण का उद्देश्य आंकड़ों को उपयोगी सूचनाओं में बदल कर नीति-निर्माताओं की आवश्यकताओं को संतुष्ट करना है। उदाहरणतः भौगोलिक सूचना तंत्र का प्रयोग दिक् और काल से संबंधित विभिन्न प्रकार की परिघटनाओं के भविष्य की प्रवृत्तियों का पूर्वानुमान प्रभावी ढंग से किया जा सकता है। फिर भी, भौगोलिक सूचना तंत्र पर आधारित किसी भी विश्लेषण को करने से पहले समस्या की पहचान और विश्लेषण के उद्देश्य को परिभाषित करना आवश्यक है। इसमें निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए चरणगत प्रक्रियाओं की आवश्यकता होती है। भौगोलिक सूचना तंत्र का प्रयोग करते हुए स्थानिक विश्लेषण के निम्नलिखित प्रचालनों को लिया जा सकता है :
फिर भी, समय और स्थान के व्यवरोध के कारण केवल अधिचित्रण और बफ़र विश्लेषण प्रचालनों की यहाँँ चर्चा की जाएगी।
अधिचित्रण विश्लेषण प्रचालन
भौगोलिक सूचना तंत्र का प्रमाण चिह्न अधिचित्रण प्रचालन है। अधिचित्रण प्रचालन का प्रयोग करके मानचित्रों के बहुगुणी स्तरों का समन्वय एक महत्वपूर्ण विश्लेषण क्रिया है। अन्य शब्दों में भौगोलिक सूचना तंत्र उसी क्षेत्र के मानचित्रों के दो अथवा अधिक विषयक स्तरों का अधिचित्रण करके नया मानचित्र स्तर प्राप्त करने
अधिचित्रण प्रचालन : x + y = z
जहाँ
आलेख निरूपण



को संभव बनाता है (चित्र 4.7)। भौगोलिक सूचना तंत्र का अधिचित्रण प्रचालन चालनी मानचित्रण जैसा है, अर्थात् तुलना करने और बहिर्वेश मानचित्र को प्राप्त करने के लिए प्रकाशीय पेज्ञ पर मानचित्रों के अनुरेखणों का अधिचित्रण करना।
मानचित्र अधिचित्रण के अनेक अनुप्रयोग है। इसका प्रयोग समय के दो भिन्न कालों में भूमि उपयोग/भूमि आवरण में परिवर्तन के अध्ययन और भूमि के रूपांतरण का विश्लेषण करना है। उदाहरणतः चित्र 4.8 सन् 1974 और सन् 2001 के दौरान नगरीय भूमि उपयोग का चित्रण करता है। जब दो मानचित्रों अधिचित्रित किया गया तो नगरीय भूमि उपयोग में परिवर्तन ज्ञात हुए (चित्र 4.9) और दी गई समय अवधि में नगरीय प्रसार का मापन किया गया। इसी प्रकार अधिचित्रण विश्लेषण दिए गए भूमि उपयोग के प्रस्तावित भूमि उपयोगों के उपयुक्तता विश्लेषण में भी उपयोगी है।


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चित्र 4.8 : 1974 और 2001 के दौरान अलीगढ़ नगर (उत्तर प्रदेश) में नगरीय भूमि उपयोग
ALIGARH CITY
Land Transformation (1974-2001)

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चित्र 4.9 : अलीगढ़ नगर में 1974-2001 के दौरान नगरीय भूमि रूपांतरण
ALIGARH CITY
Urban Sprawl (1974-2001)



LEGEND
Source : Based on Aligarh City Guide Map (1974)
and IRS 1D Satellite Imagery (2001)
बफर प्रचालन
बफ़र प्रचालन भौगोलिक सूचना तंत्र में एक अन्य महत्वपूर्ण स्थानिक विश्लेषण क्रिया है। किसी भी बिंदु, रेखा अथवा क्षेत्र लक्षण के साथ किसी निश्चित दूरी को बफ़र रचा जा सकता है। यह अस्पताल, दवा स्टोर, डामर से बनी पक्की सड़कों, क्षेत्रीय पाकों इत्यादि सुविधाओं और सेवाओं से लाभान्वित अथवा वाँचित क्षेत्रों/जनसंख्या की स्थिति निर्धारण में उपयोगी है। इसी प्रकार यह वायु, ध्वनि और जल प्रदूषण के बिंदुक स्त्रोतों के मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव तथा इस प्रकार प्रभावित जनसंख्या के आकार के अध्ययन
किसी वस्तु के चारों ओर 500 मीटर की दूरी तक का बफ़र



सड़क के चारों ओर 500 मीटर की दूरी तक का बफ़र



औद्योगिक संयंत्र के चारों ओर 1000 मीटर की दूरी तक का बफ़र



में उपयोगी है। इस प्रकार का विश्लेषण सामीप्य विश्लेषण कहलाता है। बफ़र प्रचालन भौगोलिक लक्षणों का विचार किए बिना बहुभुज लक्षण उत्पन्न करेगा और स्थानिक सामीप्य निरूपित करता है। उदाहरणतः किसी रसायन औद्योगिक इकाई के एक कि.मी. के बफ़र के अंतर्गत अनेक परिवार इकाई द्वारा विसर्जित औद्योगिक अपशिष्ट से प्रभावित होते हैं।
आर्क व्यू/आर्क जी आई एस जियोमीडिया और भौगोलिक सूचना तंत्र के अन्य सॉफ्टवेयर बिंदु, रेखा और क्षेत्र लक्षण के साथ बफ़र विश्लेषण के माँड्यूल्स प्रस्तुत करते हैं। उदाहरण के तौर पर किसी भी उपलब्ध सॉफ्टवेयर के उपयुक्त निर्देशों का प्रयोग करते हुए नगरों में स्थित प्रमुख अस्पतालों के चारों ओर 2, 4, 6, 8 और 10 कि.मी. का बफ़र बनाया जा सकता है। एक प्रकरण अध्ययन के तौर पर सहारनपुर, मुज्जफरनगर, मेरठ, गाजियाबाद, गौतमबुढ़ नगर और अलीगढ़ की बिंदुक स्थितियों का मानचित्रण किया गया है। (चित्र 4.12) तथा उन नगरों से जहाँः अस्पताल पाए जाते हैं बफ़र की रचना की गई है। आप पर्यवेक्षण कर सकते हैं कि नगर के निकट अवस्थित क्षेत्र बेहतर ढंग से पोषित हैं और नगरों से दूर रहने वाले लोगों को चिकित्सा सुविधाओं का उपयोग करने के लिए लंबी दूरियाँ तय करनी पड़ती हैं और ये क्षेत्र अल्पतम लाभान्वित हैं (चित्र 4.13)।


अधिक जानकारी के लिए इंटरनेट स्त्रोत
अभ्यास
1. नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए :
(i) स्थानिक आंकड़ों के लक्षण निम्नांकित स्वरूप में दिखाई देते हैं-
(क) अवस्थितिक
(ख) रैखिक
(ग) क्षेत्रीय
(घ) उपर्युक्त सभी स्वरूपों में
(ii) विश्लेषक माँड्यूल साँफ्टवेयर के लिए कौन-सा एक प्रचालन आवश्यक है?
(क) आंकड़ा संग्रहण
(ख) आंकड़ा प्रदर्शन
(ग) आंकड़ा निष्कर्षण
(घ) बफरिंग
(iii) चित्ररेखापुँज (रैस्टर) आंकड़ा फॉरमेट का एक अवगुण क्या है?
(क) सरल आंकड़ा संरचना
(ख) सहज एवं कुशल उपरिशायी
(ग) सुदूर संवेदन प्रतिबिंब के लिए सक्षम
(घ) कठिन परिपथ चाल विश्लेषण
(iv) सदिश (वेक्टर) आंकड़ा फॉरमेट का एक गुण क्या है?
(क) समिश्र आंकड़ा संरचना
(ख) कठिन उपरिशायी प्रचालन
(ग) सुदूर संवेदन आंकड़ों के साथ कठिन सुसंगतता
(घ) सघन आंकड़ा संरचना
(v) भौगोलिक सूचना तंत्र कोट में उपयोग कर नगरीय परिवर्तन की पहचान कुशलतापूर्वक की जाती है-
(क) उपरिशायी प्रचालन
(ख) सामीप्य विश्लेषण
(ग) परिपथ जाल विश्लेषण
(घ) बफरिंग
2. निम्नांकित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए :
(i) चित्ररेखापुँज एवं सदिश (वेक्टर) आंकड़ा मॉडल के मध्य अंतर
(ii) उपरिशायी विश्लेषण क्या है?
(iii) भौगोलिक सूचना तंत्र में हस्तचलित विधि के गुण क्या हैं?
(iv) भौगोलिक सूचना तंत्र के महत्वपूर्ण घटक क्या हैं?
(v) भौगोलिक सूचना तंत्र के कोर में स्थानिक सूचना बनाने की विधि क्या है?
(vi) स्थानिक सूचना प्रौद्योगिकी क्या है?
3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 125 शब्दों में दीजिए :
(i) चित्ररेखापुँज (रैस्टर) एवं सदिश (वेक्टर) आंकड़ा फॉरमेट को उदाहरण सहित समझाइए।
(ii) भौगोलिक सूचना तंत्र से संबंधित कार्यों को क्रमबढ़ रूप में किस प्रकार किया जाता है एक व्याख्यात्मक लेख प्रस्तुत कीजिए।
शब्दावली
आयतचित्र : बारंबारता बंटन, जैसे वर्षा क्षतु के अनुसार बारंबारता का ग्राफ़ीय प्रदर्शन।
केंद्रीय प्रवृत्ति : सांख्यिकीय/मात्रात्मक आंकड़ों की प्रवृत्ति किसी मान के आसपास/चतुर्दिक गुच्छित होती है।
चक्रारेख : वृत्तीय आरेख जिसमें आंकड़ों को प्रतिशत के रूप में प्रदर्शित करने के लिए वृत्त को त्रिज्या-खंडों में विभाजित करते हैं।
चर : कोई भी अभिलक्षण जो बद्लता रहता है। संख्यात्मक/मात्रात्मक चर वह अभिलक्षण है जिसके अलग-अलग मान होते हैं और उनका अंतर संख्यात्मक रूप में मापा जा सकता है। उदाहरण के लिए वर्षा एक संख्यात्मक चर है क्योंकि विभिन्न क्षेत्रों अथवा विभिन्न अवधियों में हुई वर्षा के अलग-अलग मानों के अंतरों को नापा जा सकता है। इसके विपरीत गुणात्मक चर वह अभिलक्षण है जिसके अलग-अलग मानों को संख्यात्मक रूप में माप नहीं सकते। उदाहरण के लिए लिंग (सेक्स) एक गुणात्मक चर है यह स्त्री अथवा पुरुष कोई भी हो सकता है। गुणात्मक चर को गुणा भी कहा जाता है।
दंड आरेख : स्तंभों या दंडों की एक श्रृंखला है जिसमें दंडों की लंबाई उनके द्वारा प्रदर्शित मात्रा के अनुपात में होती है। ये दंड चुने हुए मानक/पैमाने के अनुसार खींचे जाते हैं। ये क्षौतिज अथवा ऊध्वाधिर रूप में खींचे जा सकते हैं।
प्रवाह मानचित्र : मानचित्र जिनमें ‘प्रवाह’ अर्थत् लोगों या वस्तुओं का गमनागमन धारियों/पट्टियों द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। इन धारियों/पट्टियों की मोटाई उनके द्वारा प्रदर्शित विभिन्न मार्गों पर आने-जाने वाली वस्तुओं की मात्रा या लोगों की संख्या के अनुपात में होती है।
बहुलक : किसी श्रेणी में बहुलक चरांक का वह मान होता है जो सबसे अधिक बार आता है। दूसरे शब्दों में बहुलक पद का वह मान है जिसकी बारंबारता सबसे अधिक होती है।
माध्य विचलन : किसी केंद्रीय मान से विचलनों के ऑसत द्वारा परिक्षेपण का माप। ऐसे विचलनों को निरपेक्ष रूप में लिया जाता है अर्थात् उनके धनात्मक अथवा ऋष्णात्मक पूर्ण श्रेणी चिह्नों पर ध्यान नहीं दिया जाता। केंद्रीय मान सामान्यतः माध्यिका या माध्य होता है।
माध्यिका : जब किसी श्रेणी के पदों के विस्तार को आरोही अथवा अवरोही क्रम में रखा जाता है तो मध्य का पद माध्यिका कहलाती है। इससे स्पष्ट हुआ कि माध्यिका पूर्ण श्रेणी को दो बराबर भागों में बाँटती है और इससे आधे पदों के मान ऊपर और आधे पदों के मान नीचे होते हैं।
मानक विचलन : विक्षेपण के सर्वनिरपेक्ष मापकों में यह सबसे सामान्य मापक है। यह श्रेणी के समस्त माध्य से निकाले गए विचलनों के वर्गों के माध्य का धनात्मक वर्गमूल होता है।
वर्ग-अंतराल : किसी बारंबारता बंटन के ऊपरी-वर्ग और निचले/निम्न वर्ग की सीमाओं के बीच का अंतर वर्ग अंतराल कहलाता है।
वर्णामात्री मानचित्र : मानचित्रों जिनमें किसी दिए गए तत्व का विवरण विभिन्न आभाओं या रंगों की गहनता या सघनता के द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।
विक्षेपण या फैलाव : किसी चरांक के विभिन्न मानों में आंतरिक विभिन्नताओं की गहनता।
सारणीयन : अशोधित आंकड़ों को सारणी के रूप में व्यवस्थित करने की प्रक्रिया।
संचयी बारंबारता : विभिन्न वर्ग अंतरालों में मापों के बंटन का माप, जो कुल बारंबारता के प्रतिशत के रूप में, किसी निश्चित मान से अधिक अथवा कम मानों के रूप में व्यक्त किया जाता है।
सह-संबंध गुणांक : दो चरों के बीच संबंधों की दिशा और गहनता का माप।





पूर्ति








