स्थलाकृतिक मानचित्र
आप जानते हैं कि मानचित्र एक महत्वपूर्ण भौगोलिक उपकरण है। आप यह भी जानते हैं कि मानचित्रों का वर्गीकरण उनकी मापनी एवं कार्यों के आधार पर होता है। अध्याय 1 में उल्लेखित स्थलाकृतिक मानचित्र भूगोलवेत्ताओं के लिए बहुत-ही अधिक महत्वपूर्ण हैं। इस मानचित्र को आधार मानकर सभी मानचित्र बनाए जाते हैं।
स्थलाकृतिक मानचित्र, जिसे सामान्य उपयोग वाले मानचित्रों के नाम से भी जाना जाता है, को आपेक्षिक बृहत मापनी पर बनाया जाता है। इन मानचित्रों में महत्वपूर्ण प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक लक्षणों, जैसे- उच्चावच, वनस्पति, जलाशय, कृषिगत भूमि, बस्तियों एवं परिवहन तंत्र आदि को प्रदर्शित किया जाता है। ये मानचित्र सभी देशों की राष्ट्रीय मानचित्र संगठनों द्वारा तैयार एवं प्रकाशित किए जाते हैं। उदाहरण के लिए, भारतीय सर्वेक्षण विभाग, भारत में, पूरे देश के लिए स्थलाकृतिक मानचित्र तैयार करता है। स्थलाकृतिक मानचित्र विभिन्न मापनियों पर मानचित्र शृंखला के रूप में तैयार किए जाते हैं। इसलिए दी हुई शृंखला के सभी मानचित्रों में एक ही प्रकार के संदर्भ बिंदु, मापनी, प्रक्षेप, रूढ़ चिहाँं तथा रंगों का प्रयोग किया जाता है।
भारत में स्थलाकृतिक मानचित्र दो शृंखलाओं में तैयार किए जाते हैं - भारत एवं पड़ोसी देशों की शृंखला तथा विश्व के अंतराष्ट्रीय मानचित्रों की शृंखला।
भारत एवं उसके पड़ोसी देशों की शृंखला :
सन् 1937 में दिल्ली सर्वेक्षण सम्पेलन होने तक भारत एवं उसके पड़ोसी देशों की श्रृंखला वाले मानचित्रों का निर्माण भारतीय सर्वेक्षण विभाग ढ्वारा किया जाता था। उसके बाद, पड़ोसी देशों वाले मानचित्रों का निर्माण बंद कर दिया गया तथा भारत का सर्वेक्षण विभाग केवल विश्व के अंतराष्ट्रीय मानचित्रों वाली श्रृंखला के विनिर्देशों के आधार पर भारत के स्थलाकृतिक मानचित्रों का निर्माण एवं प्रकाशन करने लगा। परंतु भारतीय सर्वेक्षण विभाग ने स्थलाकृतिक मानचित्रों के लिए नयी श्रृंखला के अंतरगत छोड़ दी गई भारत और पड़ोसी देशों की श्रृंखला के संख्यात्मक प्रणाली और विन्यास को अभिधारण किया है।
भारत का स्थलाकृतिक मानचित्र 1:10,00,000, 1:2,50,000, 1:1,25,000, 1:50,000 तथा 1:25,000 की मापनी पर तैयार किया जाता है, जिसमें अक्षांशीय एवं देशांतरीय मान क्रमशः 4° × 4°, 1° × 1°, 30' × 30', 15' × 15' तथा 5' × 7'30'' होते हैं। इनमें से प्रत्येक मानचित्र की संख्यात्मक प्रणाली को चित्र 5.1 में दिखाया गया है।
शब्दावली
अनुप्रस्थ परिच्छेद : किसी सरल रेखा पर ऊध्वाधिर कटी हुई भूमि का पाशर्वचित्रा। इसे परिच्छेद अथवा परिच्छेदिका भी कहते हैं।
समोच्च रेखाः समुद्र तल से समान ऊँचाई पर स्थित बिंदुओं को मिलाने वाली काल्पनिक रेखा। इसे समतल रेखा भी कहते हैं।
समोच्चरेखीय अंतराल : दो उत्तरोत्तर समोच्च रेखाओं के बीच का अंतरा। इसे ऊध्वाधिर अंतराल भी कहते हैं। यह प्रायः अंग्रेजी के अक्षरों द्वारा लिखा जाता है। किसी भी मानचित्र पर प्रायः इसका मान स्थिर होता है।
स्थलाकृतिक मानचित्र : भू सतह के प्राकृतिक एवं मानवकृत ब्यौरों को प्रदर्शित करने वाला, बड़ी मापनी पर खींचा गया, एक छोटे क्षेत्र का मानचित्र। इस मानचित्र पर उच्चावच समोच्च रेखाओं द्वारा प्रकट किया जाता है।
हैश्यूर : मानचित्र पर समोच्च रेखाओं को लंबवत् काटती हुई महत्तम ढाल की दिशा में खींची गई छोटी सरल रेखाएँ। ये भूमि के ढाल में अंतरों का बोध भी कराती हैं।
विश्व की अंतराष्ट्रीय मानचित्र शृंखला: विश्व की अंतराष्ट्रीय मानचित्र शृंखला के अंतर्गत स्थलाकृतिक मानचित्र बृहत मापनी पर पूरे विश्व के लिए 1:10,00,000 अथवा 1:2,50,000 की मापनी पर मानकीकृत मानचित्र तैयार करने के लिए अभिकल्पित (डिज्ञाईन) किए जाते हैं।
स्थलाकृतिक मानचित्र पठन : स्थलाकृतिक मानचित्रों का अध्ययन आसान होता है। इसके लिए पाठक को मानचित्रों पर दी गई निर्देशिका, रुढ़ चिह, प्रतीक एवं रंगों को जानना आवश्यक है। स्थलाकृतिक मानचित्रों पर दिए गए रुढ़ चिहों एवं संकेतों को चित्र 5.2 में दिखाया गया है।

सड़कें, पक्कीः महत्वानुसार, मील पत्थर....
सड़कें, कच्ची: महत्वानुसार, पुल....
रास्ता, लद्दू का, दरें सहित, पगडंडी, पुल सहित....
नाले तल में मार्ग सहित, अनिश्चित, नहर....
बाँध : चिना हुआ अथवा पत्थरों से पटा, मिट्री से पटा, बंधिका....
नदी : सूखी, धारा सहित, द्वीप और चट्टान सहित; ज्वारीय नदी......
दलदल : नद......
कूप : पक्का, कच्चा। सोता। तालाब : बारहमासी; अन्य....
पुश्ते : सड़क अथवा रेल की पटरी के....
रेल की पटरीः चौड़ी लाइन, दोहरी; इकहरी स्टेशन सहित, निर्माणाथीन....
रेल की पटरी : अन्य लाइनें, दोहरी; इकहरी मील-पत्थर सहित, निर्माणाधीन......
हल्की रेलवे या ट्रामवे। तारा कटान सुरंग सहित ....
समोच्च-रेखाएँ, भृगु....
बालू के आकार (1) सपाट, (2) बालू के टिब्ने (पक्के), (3) बालू के टिब्ने (कच्चे)..
नगर अथवा गाँव : आबाद, उजाड़, गढ़....
झोपड़ियाँ : स्थाई, अस्थाई। मीनार। पुरातन अवशेष......
मंदिर, छतरी, गिरजाधर, मस्जिद, ईदगाह, मकबरा, कब्रें....
प्रकाश स्तंभ। प्रकाशपोत। बोया : प्रकाशित, अप्रकाशित, लंगरगाह....
खान, बेल, जाली पर चढ़ी, घास, झाड़......
पनई ताड़, अन्य ताड़, शंकु जाति, बाँस, अन्य पेड़....
सीमा: अंतरिष्ट्रीय....
सीमा राज्यः सीमांकित, असीमांकित....
सीमा-ज्जिला: परगना, तहसील या ताल्लुक, वन....
सीमा-स्तंभः सर्वेक्षित, अनुपलब्ध, गाँवों का त्रिसीमास्तंभ....
ऊँचाईः त्रिकोणीय, चांदे की बिंदु, सनिकट....
तल चिह्न, ज्योडीय, तरशियरी, नहर, अन्य....
डाकघर, थाना....
डाक या यात्री बंगला, निरीक्षण भवन, विश्राम गृह......
सर्किट हाउस, पड़ाव....
वन : आरक्षित, संरक्षित....

उच्चावच निस्पण विधियाँ
भूपृष्ठ समतल नहीं है तथा इसमें विभिन्न पर्वत, पहाड़ियाँ, पठार तथा मैदान हैं। भूपृष्ठ के उत्थान एवं अवनमन भौतिक लक्षणों या उच्चावच के रूप में जाने जाते हैं। इन लक्षणों को दर्शने वाले मानचित्र को उच्चावच मानचित्र कहते हैं।
वर्षों से मानचित्रों पर उच्चावच लक्षण प्रदर्शित करने के लिए अनेक विधियों का उपयोग होता रहा है। ये विधियाँ हैं : हैश्यूर, पहाड़ी छायांकन, स्तर आभा, बेंच मार्क, स्थानिक ऊँचाई तथा समोच्च रेखाएँ। परंतु सभी स्थलाकृतिक मानचित्रों पर किसी क्षेत्र के उच्चावच को दिखाने के लिए समोच्च रेखा एवं स्थानिक ऊँचाइयों का सर्वाधिक उपयोग किया जाता है।
समोच्च रेखा
समोच्च रेखा माध्य समुद्र तल से समान ऊँचाई वाले बिंदुओं को मिलाने वाली काल्पनिक रेखा होती है। वह मानचित्र, जो भू-आकृति को समोच्च रेखाओं द्वारा दर्शाता है, समोच्च रेखा मानचित्र कहलाता है। उच्चावच लक्षणों को समोच्च रेखा के द्वारा दर्शाना अत्यधिक उपयोगी एवं लोकप्रिय विधि है। मानचित्र पर समोच्च रेखाएँ एक क्षेत्र की स्थलाकृति को समझने की सबसे उपयोगी विधि है।
पहले स्थलाकृतिक मानचित्रों में समोच्च रेखाओं को खींचने के लिए धरातलीय सर्वेक्षण तथा तल-मापन विधि का उपयोग किया जाता था। लेकिन अब फ्रोटोग्राफ्री के आविष्कार तथा वायव फ्रोटोग्राफ्री से सर्वेक्षण तथा तल मापन एवं मानचित्रीकरण की पुरानी पढ़तियों का प्रयोग छोड़ दिया गया है। फलस्वरूप, स्थलाकृतिक मानचित्र बनाने के लिए इन फ्रोटोग्राफ्र का उपयोग होता है।
समोच्च रेखाएँ माध्य समुद्र तल के ऊपर विभिन्न ऊध्वाधर अंतरालों (VI), जैसे- 20, 50, 100 मीटर पर खींची जाती हैं। इसे समोच्च रेखाओं का अंतराल कहा जाता है। दिए गए मानचित्र पर प्रायः यह नियत होता है। इसे सामान्यतः मीटर में व्यक्त किया जाता है। एक स्थान से दूसरे स्थान पर ढाल की प्रकृति के अनुसार दो समोच्च रेखाओं के बीच की क्षैतिजीय ढूरी में अंतर होता है, जबकि उनके बीच का ऊध्वाधर अंतराल अचल होता है। क्षैतिज ढूरी, जिसे क्षैतिज तुल्यांक (HE) के नाम से भी जाना जाता है, मंद ढाल के लिए अधिक एवं तीव्र ढाल के लिए कम होती है।
समोच्च रेखाओं के कुछ मूल लक्षण :-
समोच्च रेखाओं एवं उनके अनुप्रस्थ परिच्छेद खींचना
हम जानते हैं कि सभी स्थलाकृतिक आकृतियों के ढाल अलग-अलग होते हैं। उदाहरण के लिए, एक समतल सतह का ढाल कम होता है तथा भृगु एवं महाखडु तीव्र ढाल वाले होते हैं। इसी प्रकार घाटियों एवं पर्वत शृंखलाओं में विभिन्न प्रकार की तीव्रता वाले ढाल होते हैं, जो खड़े ढाल से कम ढाल तक हो सकते हैं। इसलिए, ढालों को दर्शनि के कारण समोच्च रेखाओं के बीच का अंतर बहुत-ही अधिक महत्वपूर्ण होता है।
ढाल के प्रकार :
ढालों को मुख्यतः मंद, खड़ा, अवतल, उत्तल एवं तरंगित भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है। विभिन्न प्रकार के ढालों की समोच्च रेखा एक विशिष्ट अंतराल की पढङति को दर्शिता है। ढाल को डिग्री या कोण में भी व्यक्त किया जाता है।
मंद ढाल :
जब किसी स्थलाकृति के ढाल की डिग्री या कोण बहुत कम होता है, तब ढाल मंद होता है। इस प्रकार की ढालों की समोच्च रेखाओं के बीच की दूरी बहुत अधिक होती है।
खड़ी ढाल :
जब किसी स्थलाकृति के ढाल का कोण अधिक होता है, तो इनकी समोच्च रेखाओं के बीच की आपसी दूरी बहुत कम होती है तथा ये खड़ी ढाल को इंगित करते हैं।




अवतल ढाल :
जब उच्चावच स्थलाकृति का निचला भाग मंद ढाल वाला एवं ऊपरी भाग खड़े ढाल वाला हो, तो उसे अवतल ढाल कहा जाता है। इस प्रकार के ढाल में समोच्च रेखाएँ निचले भाग में दूर-दूर तथा ऊपरी भाग में पास-पास होती हैं।
उत्तल ढाल :
अवतल ढाल के विपरीत, उत्तल ढाल का ऊपरी भाग मंद एवं निचला भाग खड़ा होता है। इसके परिणामस्वरूप ऊपरी भाग में समोच्च रेखाएँ दूर-दूर तथा निचले भाग में पास-पास होती हैं।




स्थलाकृतियों के प्रकार
शंक्वाकार पहाड़ी
यह आसपास की भूमि से लगभग समान रूप से उठी होती है। एक शंक्वाकार, समान ढाल वाली पहाड़ी के लिए समोच्च रेखाएँ संकेंद्री एवं नियमित अंतराल पर होंगी।
पठार
एक विस्तृत चपटा उठा हुआ भूभाग, जिसकी ढाल अपेक्षाकृत पाश्वों पर खड़ी होती है तथा जो आसपास के मैदान या समुद्र से ऊँची उठी होती है, पठार कहलाती है। पठारों को दर्शाने वाली समोच्च रेखाएँ सामान्यतः किनारों पर पास-पास तथा भीतर की ओर दूर-दूर होती हैं।




घाटी :
यह दो पहाड़ियों या कटकों के बीच भूमि का निम्न क्षेत्र है, जो एक नदी या हिमानी के पार्श्व अपरदन के परिणामस्वरूप बनती है।
V आकार की घाटी
यह V अक्षर की तरह दिखाई देती है। V आकार की घाटी पर्वतीय क्षेत्रों में पायी जाती है। V आकार की घाटी का निचला भाग भीतरी समोच्च रेखाओं के द्वारा दिखाया जाता है, जो पास-पास स्थित होते हैं तथा जिनके समोच्च का मान कम होता है। बाहर की ओर स्थित समोच्च रेखाओं का मान एकसमान रूप से बढ़ता है।
U आकार की घाटी
ऊँचाई पर स्थित हिमानियों के पाशर्व अपरदन के कारण इस प्रकार की घाटी का निर्माण होता है। इसका निचला तल चौढ़ा एवं चपटा तथा किनारे खड़े होते हैं, जिसके कारण इसका आकार U अक्षर के समान प्रतीत होता है। U आकार की घाटी के सबसे निचले हिस्से को सबसे भीतर स्थित समोच्च रेखाओं के द्वारा दर्शिया जाता है तथा इसके दोनों किनारों के बीच का अंतर अधिक होता है। बाहर की ओर स्थित दूसरी समोच्च रेखाओं के लिए एकसमान अंतराल के साथ समोच्च रेखाओं का मान बढ़ता जाता है।

महाखडु(गार्ज)
उच्च भागों में, जहाँ नदियों के द्वारा पाशर्व अपरदन की अपेक्षा ऊध्वाधर अपरदन की क्रिया तीत्र होती है, वहाँ तंग घाटी का निर्माण होता है। ये गहरी तथा संकरी नदी घाटियाँ होती हैं, जिनके दोनों किनारों का ढाल बहुत तीत्र होता है। तंग घाटी को पास-पास स्थित समोच्च रेखाओं के द्वारा दर्शाया जाता है, जिसमें भीतरी समोच्च रेखाओं के बीच का अंतर बहुत कम होता है, जो इसके दोनों किनारे को दिखाता है।
पर्वतस्कंध
पर्वत श्रृंखलाओं से घाटी की ओर की झुकी हुई उत्तल ढाल वाली आकृति को स्पर या पर्वतस्कंध कहा जाता है। इसे V आकार की समोच्च रेखा के द्वारा दर्शाया जाता है, लेकिन विपरीत तरीके से। V के दोनों किनारे ऊँचाई वाले भाग को दिखाते हैं तथा इसकी चोटी निचले हिस्से को।




भृगु
यह अत्यधिक तीत्र ढाल या खड़े पाश्वों वाली भू-आकृति है। मानचित्र पर भृगु की पहचान पास-पास बनी समोच्च रेखाओं से की जाती है, जो आपस में जुड़ी हुई प्रतीत होती हैं।
जलप्रपात
किसी नदी तल पर काफ़ी ऊँचाई से पानी का अचानक ऊर्थवंधर गिरना जलप्रपात कहलाता है। कभी-कभी जलप्रपात सोपानी धारा के रूप में गिरता है, जिसे रैपिड कहा जाता है। मानचित्र पर नदी को पार करती हुई समोच्च रेखाओं के परस्पर मिल जाने से जलप्रपात को पहचाना जा सकता है तथा रैपिड को अपेक्षाकृत दूर स्थित समोच्च रेखाओं के द्वारा।

अनुप्रस्थ परिच्छेद बनाने के चरण :
विभिन्न उच्चावच स्थलाकृतियों का उनके समोच्च रेखाओं से निम्नलिखित चरणों में अनुप्रस्थ परिच्छेद खींचा जा सकता हैः:
स्थलाकृतिक शीट पर सांस्कृतिक लक्षणों की पहचान
बस्तियाँ, भवन, रेलमार्ग एवं सड़क मार्ग रूढ़ चिन्हों, प्रतीकों एवं रंगों के द्वारा स्थलाकृतिक शीट पर दिखाए जाने वाले महत्वपूर्ण सांस्कृतिक लक्षण हैं। इन लक्षणों की अवस्थिति एवं उनका वितरण प्रारूप मानचित्र पर दर्शाए गए क्षेत्र को समझने में सहायता प्रदान करते हैं।
बस्तियों का वितरण
इसके वितरण को मानचित्र पर इनकी स्थिति, अवस्थिति, प्रारूप, संरक्षण तथा घनत्व द्वारा देख सकते हैं। बस्ती मानचित्र एवं समोच्च मानचित्रों की परस्पर तुलना के द्वारा बस्तियों के विभिन्न प्रकारों की प्रकृति एवं कारण को समझा जा सकता है।
मानचित्र पर चार प्रकार की ग्रामीण बस्तियों को पहचाना जा सकता हैः
इसी तरह नगर केंद्रों की भी पहचान की जा सकती है :
बस्तियों के चुनाव को निर्धारित करने वाले अनेक कारक होते हैं, जैसे :
मानव बस्तियों के स्थल का परीक्षण समोच्च रेखा एवं अपवाह तंत्र मानचित्र के संदर्भ में बहुत निकटता से करना चाहिए। बस्तियों का घनत्व खाद्य पदार्थों की पूर्ति से प्रत्यक्ष रूप से संबंधित होता है। कभी-कभी ग्रामीण बस्तियों का सरैखण होता है, यानी ये नदी घाटी, सड़क, तटबंध, तटरेखा के साथ वितरित होती हैं। इन्हें रैखिक प्रारूप कहते हैं।
नगरीय बस्तियों में, एक चतुष्पथ नगर पंखे की आकृति का स्वरूप ग्रहण करता है, जिसमें मकान सड़कों के किनारे व्यवस्थित होते हैं, तथा मुख्य बाज्ञार एवं नगर के केंद्र में चौराहे होते हैं। एक नोडीय नगर में सड़कें केंद्र से सभी दिशाओं में जाती हैं।
यातायात एवं संचार का प्रतिस्प
उपयोग में लाए जाने वाले यातायात के साधनों तथा परिवहन जाल के घनत्व का उच्चावच, जनसंख्या आकार तथा संसाधन विकास के प्रारूपों से घनिष्ठ संबंध होता है। ये रूढ़ि चिहां एवं प्रतीकों के द्वारा दर्शाए जाते हैं। मानचित्र पर दिखाए गए परिवहन तथा संचार के साधन हमें उस क्षेत्र के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करते हैं।
स्थलाकृतिक मानचित्रों का निर्वचन
स्थलाकृतिक मानचित्र को पढ़ने एवं समझने के लिए मानचित्रों की भाषा तथा दिशा का ज्ञान होना आवश्यक है। आपको पहले उत्तर रेखा एवं मापनी को देखना होगा तथा उसी के अनुसार अपने आप को ओरियन्ट करना होगा। विभिन्न स्थलाकृतियों के लिए उपयोग में लाए गए रुढ़चिहां के बारे में जानकारी होना आवश्यक है। सभी स्थलाकृतिक शीट में मानचित्रों में इस्तेमाल होने वाले रूढ़ चिह्नों तथा प्रतीकों को दर्शाया जाता है। ये रूढ़ चिह्न एवं प्रतीक पूरे विश्व में स्वीकृत हैं, कोई भी व्यक्ति विश्व में कहीं भी बिना उस देश की भाषा जाने भी इन मानचित्रों को पढ़ सकता है।
सामान्यतः जिन शीर्षकों के अंतर्गत स्थलाकृतिक मानचित्रों की व्याख्या की जाती है, वे हैं :
उपांत सूचनाएँ : मानचित्र की सीमाओं पर लिखी गई सूचनाओं को उपांत सूचनाएँ कहते हैं। इसमें स्थलाकृतिक शीट संख्या, इसकी स्थिति, डिग्री एवं मिनट में इसका विस्तार, मापनी एवं सम्मिलित जिले, आदि की सूचनाएँ होती हैं।
क्षेत्र का उच्चावच : इसमें किसी क्षेत्र के सामान्य स्थलाकृति का अध्ययन मैदानों, पठारों, पहाड़ियों या पर्वतों को उनके शिखरों, टीलों एवं ढाल की दिशा के साथ किया जाता है। इन आकृतियों को निम्नलिखित वर्गों के अंतर्गत पढ़ा जाता है :
क्षेत्र का अपवाह : महत्वपूर्ण नदियाँ एवं उनकी सहायक नदियाँ तथा उनके द्वारा बनाए गए घाटियों के प्रकार एवं विस्तार। उनके द्वारा बनाए गए अपवाह तंत्र, जैसे- दुमाकृतिक, अरीय, वलय, जालीनुमा एवं आंतरिक इत्यादि की व्याख्या की जाती है।
भूमि उपयोग : इसमें विभिन्न प्रकारों से भूमि उपयोगों का विश्लेषण किया जा सकता है, जैसे-
यातायात एवं संचार : यातायात के साधनों के अंतर्गत राष्ट्रीय तथा राज्य महामार्ग, जिला सड़कें, रथ्या, ऊँटों के रास्ते, पगडंडी, रेलवे, जल मार्ग, मुख्य संचार साधन, डाकघर इत्यादि। बस्तियाँ : निम्नलिखित शीर्षकों में बस्तियों का अध्ययन किया जाता है-
व्यवसाय : किसी क्षेत्र के लोगों के सामान्य व्यवसाय को वहाँ के भूमि उपयोग तथा बस्तियों के प्रकार के द्वारा पहचाना जा सकता है। उदाहरण के लिए, ग्रामीण क्षेत्रों में अधिसंख्य लोगों का मुख्य व्यवसाय खेती होता है, आदिवासी क्षेत्रों में लकड़ी काटना एवं प्रारंभिक खेती की अधिकता होती है तथा तटीय क्षेत्रों में मछली पकड़ने का कार्य किया जाता है। इसी प्रकार शहरों एवं नगरों में सेवाएँ तथा व्यापार लोगों का मुख्य पेशा है।
मानचित्र निर्वचन विधि
मानचित्र निर्वचन में उन कारकों का अध्ययन शामिल है, जो मानचित्र पर दिखाए गए अनेक लक्षणों के बीच संबंधों को समझने में सहायता करते हैं। उदाहरण के लिए, स्थलाकृतिक मानचित्रों पर प्राकृतिक वनस्पतियों के वितरण तथा कृषि के अंतर्गत क्षेत्रों को भू-आकृतियों एवं अपवाह तंत्र की पृष्ठ भूमि में ठीक से समझ सकते हैं। इसी प्रकार बस्तियों के वितरण को परिवहन के साधनों एवं स्थलाकृतियों के द्वारा पहचाना जा सकता है।
निम्नलिखित चरण मानचित्रों की व्याख्या में सहायता प्रदान करेंगे :
एक ही क्षेत्र के हवाई चित्रों तथा उपग्रही प्रतिर्बिंबों की तुलना उस क्षेत्र के स्थलाकृतिक मानचित्र के द्वारा की जा सकती है।
अभ्यास
1. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दें।
2. संक्षिप्त टिप्पणियाँ लिखिए-
3. स्थलाकृतिक मानचित्र निर्वचन का क्या अर्थ है तथा इसकी विधि क्या है, इसकी विवेचना कीजिए।
4. यदि आप स्थलाकृतिक शीट के सांस्कृतिक लक्षणों की व्याख्या कर रहे हैं, तो आप किस प्रकार की सूचनाएँ लेना पसंद करेंगे तथा इन सूचनाओं को कैसे प्राप्त करेंगे? उपयुक्त उदाहरण की सहायता से विवेचना करें।
5. निम्नलिखित लक्षणों के लिए रुढ़ चिहां एवं संकेतों को बनाइए :
अभ्यास (क)
समोच्च प्रणाली को देखें तथा निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दें।
एक से.मी. 2 कि.मी. को दर्शाता है


अभ्यास (ख)
स्थलाकृतिक शीट संख्या 63 K/12 जैसा कि पृष्ठ 62 पर चित्र में दिखाया गया है का अध्ययन करें तथा निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दें-
| 82°25° | 40' | 82° | 45'25° |
| 15' | ![]() | 15' | |
| 25° | 25° | ||
| 10'82° | 40' | 82° | 10'45' |
1:50,000
स्थलाकृतिक शीट संख्या 63 K/12 का भाग
अभ्यास ( ग )
पृष्ठ 64 पर दी गई स्थलाकृतिक शीट संख्या 63 K/12 का अध्ययन करें तथा निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दें-

| 82°25° | 35' | 82° | 40'25° |
| 5' | ![]() | 5' | |
| 25° | 25° | ||
| 0'82° | 35' | 82° | 0'40' |
1:50,000
स्थलाकृतिक शीट संख्या 63 K/12 का भाग


