भारत का संविधान - उद्देशिका
भारतीय अर्थव्यवस्था का विकास
कक्षा 11 के लिए पाठ्यपुस्तक


एनसीर्भ आरटी
NCERT
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद्
NATIONAL COUNCIL OF EDUCATIONAL RESEARCH AND TRAINING
प्रथम संस्करण
अप्रैल 2006 वैशाख 1928
पुनर्मुद्रण
जनवरी 2007, नवंबर 2007
मार्च 2009, जनवरी 2010
जनवरी 2011, अगस्त 2012
अप्रैल 2013, मई 2014
दिसंबर 2014, दिसंबर 2015
जनवरी 2017, नवंबर 2017
जनवरी 2019, जनवरी 2020
फरवरी 2021
संशोधित संस्करण
जनवरी 2023 पौष 1944
पुनर्मुद्रण
मार्च 2024 चैत्र 1946
जनवरी 2025 पौष 1946
फरवरी 2026 फाल्गुन 1047
PD 10T BS
© राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद्, 2006, 2023
₹ 85.00
एन.सी.ई.आर.टी. वाटरमार्क 80 जी.एस.एम. पेपर पर मुद्रित।
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प्रकाशन सहयोग
अध्यक्ष, प्रकाशन प्रभाग : एम.वी. श्रीनिवासन
मुख्य संपादक : बिज्ञान सुतार
मुख्य व्यापार प्रबंधक : अमिताभ कुमार
मुख्य उत्पादन अधिकारी : दीपक जैसवाल
(प्रभारी)
संपादक : मरियम बारा
सहायक उत्पादन अधिकारी : सायुराज ए.आर.
आवरण एवं चित्रांकन
सरिता वर्मा माथुर
आमुख
राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (2005) सुझाती है कि बच्चों के स्कूली जीवन को बाहर के जीवन से जोड़ा जाना चाहिए। यह सिद्धांत किताबी ज्ञान की उस विरासत के विपरीत है, जिसके प्रभाववश हमारी व्यवस्था आज तक स्कूल और घर के बीच अंतराल बनाये हुए है। नयी राष्ट्रीय पाठ्यचर्या पर आधारित पाठ्यक्रम और पाठ्यपुस्तकें इस बुनियादी विचार पर अमल करने का प्रयास है। इस प्रयास में हर विषय को एक मजबृत दीवार से घेर देने और जानकारी को रटा देने की प्रवृत्ति का विरोध शामिल है। आशा है कि ये कदम हमें राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1986) में वर्णित बाल-केंद्रित व्यवस्था की दिशा में काफी दूर तक ले जाएँगे।
इस प्रयत्न की सफलता अब इस बात पर निर्भर है कि स्कूलों के प्राचार्य और अध्यापक बच्चों को कल्पनाशील गतिविधियों और सवालों की मदद से सीखने और सीखने के दौरान अपने अनुभवों पर विचार करने का कितना अवसर देते है। हमें यह मानना होगा कि यदि जगह, समय और आज्ञादी दी जाए तो बच्चे बड़ों द्वारा सौपी गई सूचना-सामग्री से जुड़कर और जूझकर नये ज्ञान का सृजन करते हैं। शिक्षा के विविध साधनों एवं स्त्रोतों की अनदेखी किए जाने का प्रमुख कारण पाठ्यपुस्तक को परीक्षा का एकमात्र आधार बनाने की प्रवृत्ति है। सर्जना और पहल को विकसित करने के लिये जरूरी है कि हम बच्चों को सीखने की प्रक्रिया में पूरा भागीदार मानें और बनाएँ, उन्हें ज्ञान की निर्धारित खुराक का ग्राहक मानना छोड़ दें।
ये उद्देश्य स्कूल की दैनिक जिंदगी और कार्यशैली में काफ्री फेरबदल की माँंग करते हैं। दैनिक समय-सारणी में लचीलापन उतना ही जरूरी है जितना वार्षिक कैलेंडर के अमल में चुस्ती, जिससे शिक्षण के लिये नियत दिनों की संख्या हकीकत बन सके। शिक्षण और मूल्यांकन की विधियाँ भी इस बात को तय करेंगी कि यह पाठ्यपुस्तक स्कूल में बच्चों के जीवन को मानसिक दबाव तथा बोरियत की जगह खुशी का अनुभव उत्पन्न करने में कितनी प्रभावी सिद्ध होती है। बोझ की समस्या से निपटने के लिये पाठ्यक्रम निर्माताओं ने विभिन्न चरणों में ज्ञान का पुनर्निधारण करते समय बच्चों के मनोविज्ञान एवं अध्यापन के लिये उपलब्ध समय का ध्यान रखने की पहले से अधिक सचेत कोशिश की है। इस कोशिश को और सार्थक बनाने के यत्न में यह पाठ्यपुस्तक सोच-विचार और विस्मय, छोटे समूहों में बातचीत एवं बहस और हाथ से की जाने वाली गतिविधियों को प्राथमिकता दैती है।
एन.सी.ई.आर.टी. इस पुस्तक की रचना के लिये बनाई गई पाठ्यपुस्तक निर्माण समिति के परिश्रम के लिए कृतज्ञता व्यक्त करती है। परिषद् सामाजिक विज्ञान पाठ्यपुस्तक सलाहकार समूह के अध्यक्ष प्रोफेसर हरि वासुदेवन और अर्थशास्त्र पाठ्यपुस्तक समिति के मुख्य सलाहकार प्रोफेसर तापस मजूमदार का विशेष आभारी है। इस पाठ्यपुस्तक के विकास में कई शिक्षकों ने योगदान दिया; इस योगदान को संभव बनाने के लिये हम उनके प्राचायों के आभारी हैं। हम उन सभी संस्थाओं और संगठनों के प्रति कृतज्ञ हैं जिन्होंने अपने संसाधनों, सामग्री तथा सहयोगियों की मदद लेने में हमें उदारतापूर्वक सहयोग दिया। हम माध्यमिक एवं उच्च शिक्षा विभाग, मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा प्रोफेसर मृणाल मीरी एवं प्रोफेसर जी. पी. देशपांडे की अध्यक्षता में गठित निगरानी समिति (मॉनिटरिंग कमेटी) के सदस्यों को अपना मूल्यवान समय और सहयोग देने के लिए धन्यवाद देते है। व्यवस्थागत सुधारों और अपने प्रकाशनों में निरंतर निखार लाने के प्रति समर्पित एन.सी.ई.आर.टी. टिप्पणियों व सुझावों का स्वागत करेगी, जिनसे भावी संशोधनों में मदद ली जा सके।
निदेशक
नयी दिल्ली।
20 दिसंबर 2005
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान
और प्रशिक्षण परिषद
पाठ्यपुस्तकों में पाठ्य सामग्री का पुनर्स्योजन
कोविड-19 महामारी को देखते हुए, विद्यार्थियों के ऊपर से पाठ्य सामग्री का बोझ कम करना अनिवार्य है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 में भी विद्यार्थियों के लिए पाठ्य सामग्री का बोझ कम करने और रचनात्मक नज़रिए से अनुभवात्मक अधिगम के अवसर प्रदान करने पर जौर दिया गया है। इस पृष्ठभूमि में, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् ने सभी कक्षाओं में पाठ्यपुस्तकों को पुनर्स्योजित करने की शुरुआत की है। इस प्रक्रिया में रा.शै.अ.प्र.प. द्वारा पहले से ही विकसित कक्षावार सीखने के प्रतिफलों को ध्यान में रखा गया है।
पाठ्य सामग्रियों के पुनर्सयोजन में निम्नलिखित बिंदुओं को ध्यान में रखा गया है -
वर्तमान संस्करण, ऊपर दिए गए परिवर्तनों को शामिल करते हुए तैयार किया गया पुनर्स्योजित संस्करण है।
पाठ्यपुस्तक निर्माण समिति
अध्यक्ष, सामाजिक विज्ञान पाठ्यपुस्तक सलाहकार समिति
हरि वासुदेवन, प्रोफेसर, इतिहास विभाग, कलक्ता विश्वविद्यालय, कोलकाता।
मुख्य सलाहकार
तापस मजूमदार, एमेरिटस प्रोफ्रेसर, अर्थशास्त्र, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नयी दिल्ली।
समिति
आर. श्रीनिवासन, प्रवक्ता, अर्थशास्त्र विभाग, अरिंगनर अन्ना राजकीय कला महाविद्यालय, विल्लुपुरम तमिलनाडु।
गोपीनाथ पेरुमुला, प्रवक्ता, टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान, मुंबई।
जया सिंह, प्रवक्ता, डी.ई.एस.एस., एन.सी.ई.आर.टी., नयी दिल्ली।
निशित रंजन, पी.जी.टी. (अर्थशास्त्र), न्यू अलीपुर बहुद्देशीय विद्यालय, बेहला, कोलकाता।
नीरजा रशिम, प्रवाचक, डी.ई.एस.एस., एन.सी.ई.आर.टी., नयी दिल्ली।
नौशाद अली आजाद, प्रोफेसर, अर्थशास्त्र विभाग, जामिया मिलिया इस्लामिया, नयी दिल्ली।
प्रतिमा कुमारी, प्रवक्ता, डी.ई.एस.एस., एन.सी.ई.आर.टी., नयी दिल्ली।
पूनम बक्षसी, वरिष्ठ प्रवक्ता, अर्थशास्त्र विभाग, पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़।
बी.सी.ठाकुर, पी.जी.टी. (अर्थशास्त्र), राजकीय प्रतिभा विकास विद्यालय, दिल्ली।
राम गोपाल, प्रवाचक, अर्थशास्त्र विभाग, अन्नामलाई विश्वविद्यालय, अन्नामलाई नगर, तमिलनाडु।
सविता पटनायक, पी.जी.टी. (अर्थशास्त्र), डेमोस्ट्रेशन स्कूल, रीजनल इस्टीट्यूट ऑफ एजुकेशन, सचिवालय मार्ग, भुवनेशवर।
शर्मिष्ठा बनर्जी, प्रधानाध्यापिका, विद्या भारती बालिका उच्च विद्यालय, कोलकाता।
हिंदी अनुवाद
अनुवादक मंडल
एच. के गुप्ता, दिल्ली।
ओ. पी. अग्रवाल, नयी दिल्ली।
कांता जोशी, पी.जी.टी. (अर्थशास्त्र), राजकीय कन्या उच्च माध्यमिक विद्यालय, नयी दिल्ली।
बी. सी. ठाकुर, पी.जी.टी. (अर्थशास्त्र), राजकीय प्रतिभा विकास विद्यालय, दिल्ली।
भवानी शंकर बागला, प्रवाचक, अर्थशास्त्र विभाग, पी.जी.डी.ए.वी, नयी दिल्ली।
रश्म शर्मा, पी. जी. टी. (अर्थशास्त्र), केंद्रीय विद्यालय, जे. एन. यू. कैपस, नयी दिल्ली।
लीना सिंह, पी.जी.टी. (अर्थशास्त्र), केंद्रीय विद्यालय, ए.जी.सी.आर., दिल्ली।
श्री प्रेम दास, नयी दिल्ली।
राजेन्द्र प्रसाद तिवारी, नयी दिल्ली।
रमेश चन्द्र, नयी दिल्ली।
सदस्य समन्वयक
एम.वी. श्रीनिवासन, प्रवक्ता, डी.ई.एस.एस., एन.सी.ई.आर.टी., नयी दिल्ली।
आभार
इस पाठ्यपुस्तक के निर्माण में कई मित्रों तथा सहकर्मियों का सहयोग प्राप्त हुआ है। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् एम. करपगम, प्रवक्ता, अर्थशास्त्र विभाग, मीनाक्षी कॉलेज, चेनर्ई; जे. जॉन, निदेशक, सेंटर फॉर एजुकेशन एंड कम्युनिकेशन, नयी दिल्ली; प्रत्यूष के. मंडल, प्रवाचक, डी. ई.एस.एस.एच., एन.सी.ई.आर.टी.; नंदन रेड्डी, निदेशक (विकास), कसर्न फॉर वर्किंग चिल्डन, बैंगलोर; वी सेलवम, रिसर्च स्कॉलर, क्षेत्रीय अध्ययन संस्थान-जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नयी दिल्ली; प्रोफेसर, सतीश जैन, सेंटर फॉर इकनॉमिक स्टडीज एंड प्लाँनिंग, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, नयी दिल्ली; पूजा कपूर, मॉर्डर्न स्कूल, बाराखंबा रोड, नयी दिल्ली; प्रिया वैद्य, सरदार पटेल विद्यालय, लोधी एस्टेट, नयी दिल्ली; तथा नलिनी पद्मनाभन, डी.टी.ई.ए., सीनियर सेकंड्री स्कूल, जनकपुरी, नयी दिल्ली को इस पुस्तक के निर्माण के लिए सहयोग और सामग्री प्रदान करने हेतु आभार प्रकट करती है।
परिषद् जॉन ब्रेमैन तथा पार्थिव शाह का, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी, नयी दिल्ली द्वारा प्रकाशित उनकी पुस्तक 'वर्किंग इन दा मिल नो मोर' से फोटोग्राफ का उपयोग करने हेतु आभार व्यक्त करती है। कुछ कहानियाँ पी. साईनाथ द्वारा लिखित एवम् पेंग्यूइन बुक्स, नयी दिल्ली द्वारा प्रकाशित पुस्तक 'एवरीबॉडी लव्स ए गॉड ढ्छाउट' से ली गई है। किसानों के द्वारा की जा रही आत्महत्या से संबंधित एक चित्र 'द हिंदू' से लिया गया है। पर्यावरण मुहांं से जुड़े कुछ चित्र तथा पाठ्य-सामग्री 'स्टेट ऑफ इंडियन इनवायरमेंट-1, 2' से लिये गये हैं, जो सेंटर फॉर साइंस एंड डेवलपमेंट, नयी दिल्ली से प्रकाशित है। परिषद उन लेखकों, कॉपी राइट धारकों तथा प्रकाशकों को उनके द्वारा प्रदत्त संदर्भ सामग्रियों के लिए आभार व्यक्त करती है। परिषद् प्रेस सूचना ब्यूरो, सूचना तथा प्रसारण मंत्रालय, नयी दिल्ली; नेशनल रेल म्यूजियम, नयी दिल्ली को भी उनके फोटो पुस्तकालय में उपलब्ध चित्रों के उपयोग की अनुमति देने के लिए धन्यवाद देती है। कुछ चित्र जॉन सुरेश कुमार, सायनोडिकल बोर्ड ऑफ सोशल सर्विस; सिंधु मेनन, लेवर फाइल, नयी दिल्ली; एस. थिरूमाल मुरुगन, आचार्य, अधियमान मैट्रिकुलेशन स्कूल, ऊत्तंगराई; आर. सी. दास, सेंट्रल इस्टीच्यूट ऑफ एजुकेशनल टेक्नोलॉजी; रणुका, नेशनल इस्टीच्यूट ऑफ हेल्थ एंड फेमली वेलफेयर, नयी दिल्ली को उनके योगदान के लिए कृतजता व्यक्त करती है।
सविता सिन्हा, अध्यक्ष, सामाजिक विज्ञान एवम् मानविकी शिक्षा विभाग, एन.सी.ई.आर.टी. को भी उनके सहयोग के लिए आभार! पांडुलिपि को जाँचने-परखने तथा उनमें वाँछित परिवर्तनों के लिए सुझाव देने हेतु राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद् की सलाहकार संपादक बंदना सिंह को विशेष रूप से धन्यवाद।
इस पुस्तक के विकास में सहयोग के लिए परिषद् दिपेन्द्र कुमार, विजय कुमार, डी.टी.पी. ऑपरेटर; विभोर सिंह, पृफ रीडर; विनय शंकर पाण्डेय, कॉपी एडिटर; दिनेश कुमार, इंचार्ज कंघ्यूटर कक्ष के प्रति भी आभार व्यक्त करती है।
इस पुस्तक के प्रयोग पर
'भारतीय आर्थिक विकास' पर इस पुस्तक की रचना का मुख्य ध्येय पाठक को भारतीय अर्थव्यवस्था के समक्ष मुख्य समस्याओं और मुद्रों से परिचित कराना है। इसी प्रक्रिया में आप नव युवाओं को इन विषयों के प्रति संवेदनशील बनाने के साथ-साथ आपको विभिन्न आर्थिक क्रियाओं में सरकार की भूमिका की समालोचना कर पाने में सक्षम बनाना भी है। यह पुस्तक देश के आर्थिक संसाधनों और विभिन्न क्षेत्रकों में उनके प्रयोग के विषय में भी जानकारी प्रदान कर रही है। साथ ही भारतीय अर्थव्यवस्था के विभिन्न आयामों से जुड़े ऑँकड़ों द्वारा परिमाणात्मक जानकारी के साथ-साथ देश की आर्थिक नीतियों की भी एक झलक इसमें समाहित है। इन सबके आधार पर आशा की जा रही है कि आप अपनी विश्लेषण क्षमताओं को विकसित कर आर्थिक घटनाक्रम को समझने और भारत के आर्थिक भविष्य के विषय में अपना एक दृष्टिकोण विकसित कर पाने में सफल होंगे। फिर भी, हमारा प्रयास रहा है कि पाठक पर अवधारणाओं और ऑँकड़ों का अधिक बोझ न होने पाए।
जहाँ तक विभिन्न आर्थिक प्रश्नों और प्रवृत्तियों की बात है, पुस्तक में उनके विषय में वैकल्पिक मतों को स्पष्ट किया गया है, ताकि आप स्वयं ही उन पर ज्ञान आधारित चर्चाओं में भागीदार बन सर्कें। भारतीय आर्थिक विकास पर इस पाठ्यक्रम को पूर्ण करने के पश्चात् हमें आशा है कि आप अपने इर्द-गिर्द चल रहे संबढ़ स्तरीय आर्थिक घटनाक्रम को समझ पाएँगे और संचार माध्यमों (मीडिया) द्वारा उपलब्ध कराई गई तत्संबधी सूचना को समझ कर उसका आलोचनात्मक मूल्यांकन कर पाएँगे।
इस पाठ्यक्रम के प्रत्येक अध्याय में कुछ क्रियात्मक गतिविधियाँ भी सुझाई गई
हैं। यह कार्य आपको शिक्षकों के मार्गदर्शन में करना है। वास्तव में, इस
पाठ्यक्रम में भारतीय अर्थव्यवस्था के समझ पाने में शिक्षक की भूमिका को अधिक समृङ्किकारक और सार्थक बनाने का प्रयास किया गया है। इन क्रियात्मक गतिविधियों का कक्षा में परिचर्चा, आर्थिक सर्वेक्षण आदि सरकारी दस्तावेजों, अभिलेखों, समाचार-पत्रों, टेलीविजन, इंटरनेट व अन्य स्रोतों से जानकारी (ऑँकड़े) एकत्र करना आदि सम्मिलित है। विभिन्न
विषयों पर विद्धानों के मूल लेख और पुस्तकें पढ़ने के लिए भी शिक्षार्थियों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
इन सभी उद्देश्यों की प्राप्ति को संभव बनाने के लिए शिक्षकों को विषय आरंभ करने से पूर्व ही कुछ कार्य प्रारंभ करने होंगे। शैक्षिक वर्ष के आरंभ में ही आप पंचवर्षीय योजनाओं और नियोजन में नीति आयोग की भूमिका; कृषि, उद्योग, सेवाओं तथा गरीबी निवारण, रोजगार सवर्धन, ग्रामीण विकास, पर्यावरण, आधारिक संरचना, स्वास्थ्य, शिक्षा, ऊर्जा एवं चीन व पाकिस्तान के आर्थिक घटनाक्रम आदि के विषय में समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं आदि से उपयुक्त जानकारी एकत्र कर सकते हैं। जब शिक्षक कक्षा में कोई विषय पढ़ाना प्रारंभ करे, तो आपके पास उससे संबढ़ कतरने कक्षा में प्रदर्शित करने के लिए उपलब्ध होनी चाहिए। आपके लिए वर्ष के आरंभ में ही इन कतरनों के संग्रह करने में जुट जाना बहुत महत्वपूर्ण होगा। तभी आप उपयुक्त समय पर आवश्यक जानकारी प्रस्तुत कर पाएँगे। यह आदत भविष्य में आपकी शिक्षा के उत्तरोत्तर सोपानों में बहुत ही सहायक सिद्ध होगी।

सभी स्कूलों को प्रतिवर्ष आर्थिक सर्वेक्षण की प्रति खरीदनी होगी। यह भारतीय अर्थव्यवस्था की नवीनतम जानकारी का बहुत उपयोगी स्त्रोत होता है। इसमें संकलित रिपोटाँं से छात्रों का परिचय आवश्यक है। विभिन्न क्रियात्मक गतिविधियों में उस जानकारी का उपयोग होगा। सर्वेक्षण के सांख्यकीय परिशिष्टों के ऑँकड़े विभिन्न मुद्दों को भली-भाँति समझने में नितांत उपयोगी होंगे।
अर्थव्यवस्था के किसी भी मुहे पर चर्चा करते समय उससे जुड़े ऑँकड़ों की व्याख्या अपरिहार्य हो जाती है। यदि हम संवृद्धि दरों की बात करते हैं, तो कुल संवृद्धि और क्षेत्रकवार संवृद्धि की चर्चा ही पर्याप्त नहीं होगी। आपको संवृद्धि दरों की प्रवृत्तियों, उन दरों को उपलब्ध करने की प्रक्रियाओं तथा उन्हें संभव बनाने वाले कारकों के बारे में भी बताना अनिवार्य हो जाएगा। यह सब तो केवल संवृद्धि दरों को किसी तालिका में
दर्ज करने से कहीं आगे तक जाने पर ही संभव होगा। सभी अध्यायों में
कुछ क्रमांक अंकित बॉक्स भी हैं। इनमें मुख्य पाठ में की गई चर्चा से जुड़ी अतिरिक्त जानकारी रखी गई है। ये बॉक्स अध्ययन को वास्तविक
जीवन के अधिक निकट लाने का प्रयास है। ये ऑँकड़ों के
मानवीय पक्ष को उजागर करते हैं, किंतु ये बॉक्स और क्रियात्मक गतिविधि यों, परीक्षा एवं मूल्यांकन के लिए प्रयोग नहीं किए जाएँगे।
अध्यायों के अंत में परंपरागत अभ्यास प्रश्नों के साथ-साथ कुछ अतिरिक्त क्रियात्मक कार्य भी सुझाए गए हैं। इनमें से पाठ के बीच में दी गई अतिरिक्त गतिविधियों में से अधिक विस्तृत गतिविधियाँ शिक्षार्थियों को
अध्ययन-परियोजना के रूप में दी जा सकती है। इन परियोजनाओं की रचना में शिक्षार्थियों को पाठ्यपुस्तक की सामग्री से कहीं आगे तक जाने को प्रोत्साहित करना शिक्षकों का दायित्व होगा।


सभी स्कूलों में सूचना संबंधी प्रौद्योगिकीय सुविधाएँ सुलभ होना तो आवश्यक नहीं है, फिर भी शिक्षार्थियों को यह जानना महत्वपूर्ण होगा कि अब भारतीय अर्थव्यवस्था के

विषय में सभी जानकारियाँ इंटरनेट पर उपलब्ध हैं। आप इंटरनेट प्रयोग कर सरकारी विभागों की वेबसाइट से उपयुक्त जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। हम जानते ही हैं कि गरीबी-विषयक सारी जानकारी नीति आयोग, भूतपूर्व योजना आयोग प्रकाशित करता है। आपको यह पता
होना चाहिए कि भारत सरकार के नीति आयोग की वेबसाइट पर भारतीय अर्थव्यवस्था के अनेक आयामों से जुड़ी जानकारियाँ विभिन्न रिपोर्टों के रूप में सुलभ हैं। इन रिपोर्टों की मुद्रित प्रतियाँ प्राप्त होना सदैव संभव नहीं होगा। किंतु, नेट से इनको कष्प्यूटर पर उतार कर इनका कक्षाओं में प्रयोग तो हो सकता है।
अब तो पिछले दस वर्षों के आर्थिक सर्वेक्षण जैसे दस्तावेज www://indiabudget.gov.in नामक वेबसाइट पर उपलब्ध है। बहुत से संगठनों ने अपने वेबसाइट का पता बदला है। यदि किताब के अलग-अलग अध्यायों में दिए गए वेबसाइट नहीं खुल रहे हैं तो उन पतों को सर्च इंजन के द्वारा ढूँढ़े, जैसे गुगल (GOOGLE)(www.google.co.in)।
प्रत्येक अध्याय के मुख्य बिंदुओं को सार संक्षेप के अंतर्गत दोहराने का कार्य भी किया गया है। मुख्य पाठ में प्रयुक्त तालिकाएँ अनेक शोध-पत्रों/रचनाओं से संकलित हुई हैं। उन रचनाओं को संदर्भ ग्रंथ की सूची में रखा गया है। कितु प्रत्येक सारणी के नीचे संदर्भ स्रोत नहीं दिए हैं, क्योंकि ये विभिन्न शोध-सामग्रियों से लिए गए हैं जिनका उल्लेख ‘संदर्भ’ में किया गया है।
हम एक बार फिर यह बात दोहरा रहे हैं कि इस पुस्तक की रचना का ध्येय शिक्षार्थियों को भारतीय अर्थव्यवस्था की समष्टि स्तरीय समस्याओं से परिचित करा उन्हें उनके विषय में ज्ञान आधारित परिचर्चाओं में भागीदारी में समर्थ बनाना है। हमारा यह भी आग्रह हैं कि इस पाठ्यक्रम को सही अर्थों में समझने की सबसे अच्छी विधि परस्पर सहयोग ही होगी। अतः छात्रों और शिक्षकों को मिलजुल कर भारतीय अर्थव्यवस्था के विभिन्न पक्षों/आयामों से जुड़ी जानकारी का संकलन कर पठन-पाठन के लिए उनका सही प्रयोग करना चाहिए। आप इस किताब के किसी भी हिस्से से संबंधित अपने प्रश्न और प्रतिक्रिया निम्नलिखित पते पर भेज सकते है। कार्यक्रम समन्वयक (अर्थशास्त्र), सामाजिक विज्ञान शिक्षा विभाग, राष्ट्रीय शौक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद्, श्री अरविन्द मार्ग, नयी दिल्ली - 110016. ईमेल: [email protected].
भारत का संविधान
उद्देशिका
हम, भारत के लोग, भारत को एक ¹[संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य] बनाने के लिए, तथा उसके समस्त नागरिकों को :
सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय,
विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म
और उपासना की स्वतंत्रता,
प्रतिष्ठा और अवसर की समता
प्राप्त कराने के लिए,
तथा उन सब में
व्यक्ति की गरिमा और ²[राष्ट्र की एकता
और अखंडता] सुनिश्चित करने वाली बंधुता
बढ़ाने के लिए
दृढ़संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवंबर, 1949 ई. को एतद्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।
विषय सूची
आमुख iii
पाठ्यपुस्तकों में पाठ्य सामग्री का पुनर्सयोजन V
