उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण एक समीक्षा

आर्थिक सुधार
1991 से
नियोजित विकास के चालीस वर्षों के बाद, भारत एक सशक्त औद्योगिक आधार तथा खाद्यन्नों के उत्पादन में स्व-निर्भरता प्राप्त करने में सक्षम रहा है। इसके बावजूद, जनसंख्या का एक बड़ा भाग अपनी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर है। 1991 में, भुगतान संकट के कारण भारत में आर्थिक सुधार का सूत्रपात हुआ। इस इकाई में सुधारों की प्रक्रिया तथा भारत के संदर्भ में उनके प्रयोग का मूल्यांकन किया गया है।

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आज के विश्व में आम सहमति है कि केवल आर्थिक विकास ही सब कुछ नहीं है तथा सकल घरेलू उत्पाद ही समाज की प्रगति का एकमात्र अनिवार्य सूचक नहीं है।
-के.आर. नारायणन (भारत के पूर्व-राष्ट्रपति)
3.1 परिचय
आपने पिछले अध्याय में पढ़ा कि स्वतंत्रता के बाद भारत ने मिश्रित अर्थव्यवस्था के ढाँचे को अपनाया। इसमें पृँजीवादी अर्थव्यवस्था की विशेषताओं के साथ समाजवादी अर्थव्यवस्था की विशेषताएँ एक साथ थीं। कुछ विद्धानों का तर्क है कि इन वर्षों में इस व्यवस्था के नियमन और नियंत्रण के लिए इतने अधिक नियम-कानून बनाए गए कि उनसे आर्थिक संवृद्धि और विकास की समूची प्रक्रिया ही अवरुढ्ध हो गई। अन्य विद्धानों का मत है कि भारत जिसने अपनी विकास-यात्रा लगभग गतिहीनता के स्तर से वही आरंभ की थी, जो बचत में संवृद्धि और विविधतापूर्ण औद्योगिक आधार है तथा जो विभिन्न वस्तुओं का उत्पादन करता है। साथ ही, कृषि उत्पादन की निरंतर वृद्धि द्वारा खाद्य सुरक्षा सुनिश्चत हो चुकी है।
वर्ष 1991 में भारत को विदेशी ऋष्णों के मामले में संकट का सामना करना पड़ा। सरकार अपने विदेशी ऋष्ण के भुगतान करने की स्थिति में नहीं थी। पेट्रोलियम आदि आवश्यक वस्तुओं के आयात के लिए सामान्य रूप से रखा गया विदेशी मुद्रा रिजर्व पंद्रह दिनों के लिए आवश्यक आयात का भुगतान करने योग्य भी नहीं बचा था। इस संकट को आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि ने और भी गहन बना दिया था। इन सभी कारणों से सरकार ने कुछ नई नीतियों को अपनाया और इसने हमारी विकास रण-नीतियों की संपूर्ण दिशा को ही बदल दिया। इस अध्याय में हम उस आर्थिक संकट की पृष्ठभूमि, सरकार द्वारा अपनाई गई नीतियों तथा अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रकों पर उन नीतियों के प्रभावों पर विचार करेंगे।
3.2 पृष्ठभूमि
इस वित्तीय संकट का वास्तविक उद्गम स्रोत 1980 के दशक में अर्थव्यवस्था में अकुशल प्रबंधन था। सामान्य प्रशासन चलाने और अपनी विभिन्न नीतियों के क्रियान्वयन के लिए सरकार करों और सार्वजनिक उद्यम आदि के माध्यम से फंड जुटाती है। जब व्यय आय से अधिक हो तो सरकार बैंकों, जनसामान्य तथा अंतरिष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों से उधार लेने को बाध्य हो जाती है। इस प्रकार वह अपने घाटे का वित्तीय प्रबंध कर लेती है। कच्चे तेल आदि के आयात के लिए हमें डॉलरों में भुगतान करना होता है और ये डॉलर हम अपने उत्पादन के निर्यात द्वारा प्राप्त करते हैं।
इस अवधि में सरकार की विकास नीतियों की आवश्यकता रही क्योंकि राजस्व कम होने पर भी बेरोजगारी, गरीबी और जनसंख्या विस्फोट के कारण सरकार को अपने राजस्व से अधिक खर्च करना पड़ा। यही नहीं, सरकार द्वारा चलाए जा रहे कार्यक्रमों पर होने वाले व्यय के कारण अतिरिक्त राजस्व की प्राप्ति भी नहीं हुई। जब सरकार को प्रतिरक्षा और सामाजिक क्षेत्रों पर
भारतीय अर्थव्यवस्था का विकास अपने संसाधनों का एक बड़ा अंश खर्च करना पड़ रहा था और यह स्पष्ट था कि उन क्षेत्रों से किसी शीघ्र प्रतिफल की संभावना नहीं थी। इसकी आवश्यकता थी कि सरकार अपने बचे हुए राजस्व का बहुत ही सोच-विचार कर प्रयोग करती। बढ़ते हुए खर्चों की पूर्ति के लिये सार्वजनिक उद्यमों से भी अधिक आय अर्जित नहीं हो पा रही थी। कई बार तो अंतराष्ट्रीय संस्थानों तथा अन्य देशों से उधार ली गई विदेशी मुद्रा को उपभोग कार्यों पर ही खर्च कर दिया गया।
इस प्रकार के अनावश्यक खर्चों को निर्यांत्रित करने का न तो कोई प्रयास किया गया, न ही निरंतर बढ़ते आयात के लिए वित्त जुटाने की दृष्टि से निर्यात संवर्धन पर ही पर्याप्त ध्यान दिया गया।
1980 के दशक के अंत तक सरकार का व्यय उसके राजस्व से इतना अधिक हो गया कि ऋष्टण के द्वारा व्यय धारण क्षमता से अधिक माना जाने लगा। अनेक आवश्यक वस्तुओं की कीमतें तेजी से बढ़ने लगी। आयात की वृद्धि इतनी तीत्र रही कि निर्यात की संवृद्धि से कोई तालमेल नहीं हो पा रहा था। जैसा कि हमने पहले भी कहा है, विदेशी मुद्रा के सुरक्षित भंडार इतने क्षीण हो गए थे कि देश की दो सप्ताह की आयात आवश्यकताओं को भी पूरा नहीं कर पाते थे। अंतर्गष्ट्रीय उधारदाताओं की व्याज चुकाने के लिए भारत सरकार के पास पर्याप्त विदेशी मुद्रा नहीं बची थी। इतना ही नहीं कोई देश या अतंर्गष्ट्रीय निवेशक भी भारत में निवेश नहीं करना चाहता था।
उस स्थिति में भारत ने अंतराष्ट्रीय पुनर्निमाण और विकास बैंक (आई.बी.आर.डी.) जिसे सामान्यतः ‘विश्व बैंक’ के नाम से भी जाना जाता है और अंतराष्ट्रीय मुद्रा कोष का दरवाजा खटखटाया। उनसे देश को 7 बिलियन डॉलर का ऋण उस संकट का सामना करने के लिए मिला। किंतु, उस ऋण को पाने के लिए इन संस्थाओं ने भारत सरकार पर कुछ शर्तों लगाई; जैसे, सरकार उदारीकरण करेगी, निजी क्षेत्र पर लगे प्रतिबंधों को हटाएगी तथा अनेक क्षेत्रों में सरकारी हस्तक्षेप कम करेगी। साथ ही यह भी अपेक्षा की गई कि भारत और अन्य देशों के बीच विदेशी व्यापार पर लगे प्रतिबंध भी हटाए जायंगे।
भारत ने विश्व बैंक और अंतराष्ट्रीय मुद्रा कोष की ये शर्तें मान लीं और नई आर्थिक नीति की घोषणा की। इस नई आर्थिक नीति में व्यापक आर्थिक सुधारों को सम्मिलित किया गया। इन समस्त नीतियों का उद्देश्य अर्थव्यवस्था में अधिक स्पर्धापूर्ण व्यावसायिक वातावरण की रचना करना तथा फर्मों के व्यापार में प्रवेश करने और उनकी संवृद्धि में आनेवाली बाधाओं को दूर करना था। इन नीतियों को दो उपसमूहों में विभाजित किया जा सकता हैः स्थायित्वकारी उपाय तथा संरचनात्मक सुधार के उपाय। स्थायित्वकारी उपाय अल्पकालिक होते हैं, जिनका उद्देश्य भुगतान संतुलन में आ गई कुछ त्रुटियों को दूर करना और मुद्रास्फीति का नियंत्रण करना था। सरल शब्दों में, इसका अर्थ पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार बनाए रखने और बढ़ती हुई कीमतों पर अंकुश रखने की आवश्यकता थी। दूसरी ओर, संरचनात्मक सुधार वे दीर्घकालिक उपाय हैं, जिनका उद्देश्य अर्थव्यवस्था की कुशलता को सुधारना तथा अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रकों की अनम्यताओं को दूर कर भारत की अंतराष्ट्रीय स्पर्धा क्षमता को संवर्धित करना है। इस दृष्टि से सरकार ने अनेक नीतियाँ प्रारंभ कीं। इनके तीन उपवर्ग हैं: उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण।
3.3 उदारीकरण
हमने प्रारंभ में चर्चा की है कि आर्थिक गतिविधियों के नियमन के लिए बनाए गए नियम-कानून ही संवृद्धि और विकास के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा बन गए। उदारीकरण इन्हीं प्रतिबंधों को दूर कर अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों को ‘मुक्त’ करने की नीति थी। वैसे तो औौद्योगिक लाइसेंस प्रणाली, आयात-निर्यात नीति, तकनीकी उन्नयन, राजकोषीय और विदेशी निवेश नीतियों में उदारीकरण 1980 के दशक में भी आरंभ किए गए थे। किंतु, 1991 में आरंभ की गई सुधारवादी नीतियाँ कहीं अधिक व्यापक थीं। आइए, हम कुछ महत्वपूर्ण क्षेत्रों में किए गए सुधारों की समीक्षा करें। ये क्षेत्र हैं-औद्योगिक क्षेत्रक, वित्तीय क्षेत्रक, कर-सुधार, विदेशी विनिमय बाज्ञार, व्यापार तथा निवेश क्षेत्रक, जिनपर 1991 में तथा 1991 के बाद से विशेष ध्यान दिया गया था।
औद्योगिक क्षेत्रक का विनियमीकरण : भारत में नियमन प्रणालियों को अनेक प्रकार से लागू किया गया था (क) सबसे पहले औद्योगिक लाइसेंस की व्यवस्था थी, जिसमें उद्यमी को एक फर्म स्थापित करने, बंद करने या उत्पादन की मात्रा का निर्धारण करने के लिए किसी न किसी सरकारी अधिकारी की अनुमति प्राप्त करनी होती थी; (ख) अनेक उद्योगों में तो निजी उद्यमियों का प्रवेश ही निषिद्ध था; (ग) कुछ वस्तुओं का उत्पादन केवल लघु उद्योग ही कर सकते थे और सभी निजी उद्यमियों को कुछ औद्योगिक उत्पादों की कीमतों के निर्धारण तथा वितरण के बारे में भी अनेक नियंत्रणों का पालन करना पड़ता था।
1991 के बाद से आरंभ हुई सुधार नीतियों ने इनमें से अनेक प्रतिबंधों को समाप्त कर दिया। एल्कोहल, सिगरेट, जोखिम भरे रसायनों, औद्योगिक विस्फोटकों, इलेक्ट्रोनिकी, विमानन तथा औषधि-भेषज; इन छः उत्पाद श्रेणियों को छोड़ अन्य सभी उद्योगों के लिए लाइसोंसिंग व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया। अब सार्वजनिक क्षेत्रक के लिए सुरक्षित उद्योगों में भी केवल, परमाणु ऊर्जा उत्पादन और रेल परिवहन की कुछ मुख्य गतिविधियाँ ही बचे हैं। लघु उद्योगों द्वारा उत्पादित अधिकांश वस्तुएँ भी अब अनारक्षित श्रेणी में आ गई हैं। अधिकांश उद्योगों में अब बाज्ञार को कीमतों के निर्धारण की अनुमति मिल गई है।
वित्तीय क्षेत्रक सुधार : वित्त के क्षेत्रक में व्यावसायिक और निवेश बैंक, स्टॉक एक्सचेंज तथा विदेशी मुद्रा बाज्ञार जैसी वित्तीय संस्थाएँ सम्मिलित हैं। भारत में वित्तीय क्षेत्रक का नियमन रिजर्व बैंक का दायित्व है। भारतीय रिजर्व बैंक के विभिन्न नियम और कसौटियों के माध्यम से ही बैंकों तथा अन्य वित्तीय संस्थानों के कायों का नियमन होता है। रिजर्व बैंक ही तय करता है कि कोई बैंक अपने पास कितनी मुद्रा जमा
भारतीय अर्थव्यवस्था का विकास रख सकता है। यही ब्याज की दरों को नियत करता है। विभिन्न क्षेत्रकों को उधार देने की प्रकृति इत्यादि को भी यही तय करता है। वित्तीय क्षेत्रक सुधार नीतियों का एक प्रमुख उद्देश्य यह भी है कि रिजर्व बैंक को इस क्षेत्रक के नियंत्रक की भूमिका से हटाकर उसे इस क्षेत्रक के एक सहायक की भूमिका तक सीमित कर दिया गया है। इसका अर्थ है कि वित्तीय क्षेत्रक रिजर्व बैंक से सलाह किए बिना ही कई मामलों में अपने निर्णय लेने में स्वतंत्र हो जाएगा।
सुधार नीतियों ने ही वित्तीय क्षेत्रक में भारतीय और विदेशी निजी बैंकों को भी पदार्पण करने का अवसर दिया। बैंकों की पूँजी में विदेशी भागीदारी की सीमा 74 प्रतिशत कर दी गई। कुछ निश्चित शर्तों को पूरा करनेवाले बैंक अब रिजर्व बैंक की अनुमति के बिना ही नई शाखाएँ खोल सकते हैं तथा पुरानी शाखाओं के जाल को अधिक युक्तिसंगत बना सकते हैं। यद्यपि बैंकों को अब देश-विदेश से और अधिक संसाधन जुटाने की भी अनुमति है-पर खाता धारकों और देश के हितों की रक्षा के उद्देश्य से कुछ नियंत्रक शक्ति अभी भी रिजर्व बैंक के पास ही हैं। विदेशी निवेश संस्थाओं(एफ.आई.आई) तथा व्यापारी बैंक, म्युचुअल फंड और पेंशन कोष आदि को भी अब भारतीय वित्तीय बाज्ञारों में निवेश की अनुमति मिल गई है।
कर व्यवस्था में सुधार : इन सुधारों का संबंध सरकार की कराधान और सार्वजनिक व्यय नीतियों से है, जिन्हें सामूहिक रूप से राजकोषीय नीतियाँ भी कहा जाता है। करों के दो प्रकार होते हैः प्रत्यक्ष कर और अप्रत्यक्ष कर। प्रत्यक्ष कर व्यक्तियों की आय और व्यावसायिक उद्यामों के लाभ पर लगाए जाते हैं। 1991 के बाद से व्यक्तिगत आय पर लगाए गए करों की दरों में निरंतर कमी की गई है। इसके पीछे मुख्य धारणा यह थी कि उच्च कर दरों के कारण ही कर-वंचन होता है। अब यह व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है कि करों की दरें अधिक ऊँची नहीं हों, तो बचतों को बढ़ावा मिलता है और लोग स्वेच्छा से अपनी आय का विवरण दे देते हैं। निगम कर की दर, जो पहले बहुत अधिक थी, धीरे-धीरे कम कर दी गई है। अप्रत्यक्ष करों में भी सुधार के प्रयास किए जा रहे हैं जैसे, वस्तुओं और सेवाओं पर लगाये गये कर ताकि सभी वस्तुओं एवं सेवाओं के लिए एक साझे राष्ट्रीय स्तर के बाजार की रचना की जा सके। 2016 में भारतीय संविधान में संसोधन के ढ्वारा केन्द्र एवं राज्य सरकार को वस्तु एवं सेवा कर लगाने का अधिकार दिया गया। इस कदम से भारत में वस्तु एवं सेवा कर की शुरुआत हुई। इसके ढ्वारा सरकार को अतिरिक्त आय प्राप्त होने की, कर-वंचन कम होने की तथा ‘एक राष्ट्र, एक टैक्स, एक बाजार’ का निर्माण होने की आशा है। करदाताओं के ढ्वारा नियम पालन को प्रोत्साहित करने के लिए अनेक प्रक्रियाओं को सरल बनाया गया है, साथ ही, कर की दरों में भी पर्याप्त्र रूप से कमी की गई है।
विदेशी विनिमय सुधारः विदेशी क्षेत्रक में पहला सुधार विदेशी विनिमय बाज्ञार में किया गया था। 1991 में भुगतान संतुलन की समस्या के तत्कालिक निदान के लिए अन्य देशों की मुद्रा की तुलना में रुपये का अवमूल्यन किया
उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण-एक समीक्षा गया। इससे देश में विदेशी मुद्रा के आगमन में वृद्धि हुई। इसके अंर्तगत विदेशी विनिमय बाज्ञार में रुपये के मूल्य के निर्धारण को भी सरकारी नियंत्रण से मुक्त कराने की पहल की गई। अब तो प्रायः बाज्ञार ही विदेशी मुद्रा की माँगे और पूर्ति के आधार पर विनिमय दरों को निर्धारित कर रहा है।
ब्यापार और निवेश नीति सुधारः अर्थव्यवस्था में औद्योगिक उत्पादों और विदेशी निवेश तथा प्रौद्योगिकी की अंतरिष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा की क्षमता को प्रोत्साहित करने के लिए व्यापार और निवेश व्यवस्थाओं का उदारीकरण प्रारंभ किया गया। इस कार्यक्रम का एक उद्देश्य स्थानीय उद्योगों की कार्यकुशलता को सुधारना और उन्हें आधुनिक प्रौद्योगिकी को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना भी था।
भारत आंतरिक उद्योगों के संरक्षण के लिए आयात के परिमाण को सीमित रखने की नीतियाँ अपना रहा था। इसके लिए आयात पर कड़े नियंत्रणों और उच्च प्रशुल्कों का

इन्हें कीजिए
| देश | मुद्रा | भारतीय रूपयों में विदेशी मुद्रा की एक इकाई का मूल्य |
| संयुक्त राज्य अमेरिका | ||
| इंग्लैंड | ||
| जापान | ||
| चीन | ||
| कोरिया | ||
| सिंगापुर | ||
| जर्मनी |
प्रयोग होता था। ये नीतियाँ कुशलता और स्पर्धा क्षमता को कम करती थों, जिससे देश में विनिर्माण उद्योगों की संवृद्धि दर कम हुई। व्यापार नीतियों के सुधारों के लक्ष्य थे : (क) आयात और निर्यात पर परिमाणात्मक प्रतिबंधों की समाप्ति, (ख) प्रशुल्क दरों में कटौती और (ग) आयातों के लिए लाइसेंस प्रक्रिया की समाप्ति। हानिकारक और पर्यावरण संवेदी उद्योगों के उत्पादों को छोड़, अन्य सभी वस्तुओं पर से आयात लाइसेंस व्यवस्था समाप्त कर दी गई। अप्रैल, 2001 से कृषि पदार्थों और औद्योगिक उपभोक्ता पदार्थों के आयात भी मात्रात्मक प्रतिबंधों से मुक्त कर दिए गए। भारतीय वस्तुओं का अंतर्गष्ट्रीय बाज्ञारों में स्पर्धा शक्ति बढ़ाने के लिए उन्हें निर्यात शुल्क से मुक्त कर दिया गया है।
बॉक्स 3.1 'नवरत्न' और सार्वजनिक उद्यम नीतियाँ
आपने बचपन में सम्राट विक्रमादित्य के राज-दरबार के नवरत्नों के विषय में पढ़ा होगा जो कला, साहित्य और विद्धता के क्षेत्रों के गणमान्य विशिष्ट्जन थे। नवउदारवादी वातावरण में सार्वजनिक उपक्रमों की कुशलता बढ़ाने, उनके प्रबंधन में व्यावसायीकरण लाने और उनकी स्पर्धा क्षमता में प्रभावी सुधार लाने के लिए सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों का चयन कर उन्हें 'महारत्न, नवरत्न और लघुरत्न' घोषित कर दिया। उन्हें कंपनी के कुशलतापूर्वक संचालन और लाभ में वृद्धि करने के लिए वित्तीय संचालन कार्यों में अधिक स्वायत्तता दी गई थी।
केन्द्रीय सार्वजनिक क्षेत्रक उद्योगों को भिन्न पद प्रदान किये गए हैं। भिन्न पद वाले सार्वजनिक उद्योगों के उदाहरण इस प्रकार हैः (i) महारत्न- (अ) इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन लिमिटेड और (ब) स्टील ऑथोरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (ii) नवरत्न (अ) हिन्दुस्तान एरोनोटिक्स लिमिटेड, (ब) महानगर टेलिफोन निगम लिमिटेड (iii) लघुरत्न- (अ) भारत संचार निगम लिमिटेड, (ब) एयरपोर्ट ऑथोरिटी ऑफ इण्डिया और (स) इंडियन रेलवे केटरिंग और टूरिज्ञ कॉरपोरेशन लिमिटेड।
लाभ अर्जित कर रहे अधिकांश सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की स्थापना पहली बार 1950 और 1960 के दशकों में उस समय की गई, जब सभी सार्वजनिक नीतियाँ आत्मनिर्भरता के विचार से प्रेरित थों। उनकी स्थापना का ध्येय आधारभूत सुविधाओं का विस्तार और प्रत्यक्ष रोजगार का सूजन करना था, ताकि जनसामान्य तक उनका उच्च गुणवत्ता युक्त उत्पादन नाममात्र लागत पर पहुँचाया जा सके। इस प्रकार, इन कपंनियों को सभी पणधारियों के प्रति उत्तरदायी बनाया गया था।
इस नाम के अलंकरण के बाद से इन कंपनियों के निष्पादन में निश्चय ही सुधार आया है। विद्धानों का कहना है कि सार्वजनिक उपक्रमों के प्रसार को बढ़ावा देकर इन्हें विश्व-स्तरीय निकाय बनाने में सहायता देने के स्थान पर सरकार ने विनिवेश द्वारा ऑशिक रूप से इनका निजीकरण कर दिया है। अभी कुछ समय पहले सरकार ने इन्हें सार्वजनिक स्वामित्व में ही रखने का निर्णय किया है और उन्हें वित्तीय बाजार से स्वयं संसाधन जुटाने और विश्व बाजारों में अपना विस्तार करने के योग्य बनाया है।

इन्हें कीजिए
3.4 निजीकरण
इसका तात्पर्य है, किसी सार्वजनिक उपक्रम के स्वामित्व या प्रबंधन का सरकार द्वारा त्याग। सरकारी कंपनियाँ निजी क्षेत्रक की कंपनियों में दो प्रकार से परिवर्तित हो रही हैँ: (क) सरकार का सार्वजनिक कंपनी के स्वामित्व और प्रबंधन से बाहर होना तथा (ख) सार्वजनिक क्षेत्रक की कपनियों को सीधे बेच दिया जाना।
किसी सार्वजनिक क्षेत्रक के उधमों द्वारा
जनसामान्य को इक्विटी की बिक्री के माध्यम से निजीकरण को विनिवेश कहा जाता है। सरकार के अनुसार, इस प्रकार की बिक्री का मुख्य ध्येय वित्तीय अनुशासन बढ़ाना और आधुनिकीकरण में सहायता देना था। यह भी अपेक्षा की गई थी कि निजी पूँजी और प्रबंधन क्षमताओं का उपयोग इन सार्वजनिक उद्यमों के निष्पादन को सुधारने में प्रभावोत्पादक सिछ्ट होगा। सरकार को यह भी आशा थी कि निजीकरण से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के अंतर्वाह को भी बढावा मिलेगा।
सरकार ने सार्वजनिक उपक्रमों को प्रबंधकीय निर्णयों में स्वायत्तता प्रदान कर उनकी कार्यकुशलता को सुधारने का प्रयास किया है। उदाहरण के लिए, कुछ सार्वजनिक उपक्रमों को ‘महारत्न’, ‘नवरत्न’ और ‘लघुरत्न’ का विशेष दर्जा दिया गया है (देखें बॉक्स 3.1)।

बॉक्स 3.2 विश्वस्तरीय पद-छाप
वैश्वीकरण के कारण, अब अनेक भारतीय कंपनियाँ भी विदेशों में अपने पैर फैलाने लगी हैं। उदाहरण के लिए, ओएनजीसी विदेश, भारतीय सार्वजनिक क्षेत्र की एक सहायक तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम है जो तेल और गैस की खोज में लगी हुई है और 16 देशों में इसकी उत्पादन परियोजनाएं हैं। टाटा स्टील, 1907 में स्थापित एक निजी कंपनी है, जो 26 देशों में कार्यरत है और 50 देशों में अपने उत्पादों को बेचने के लिए दुनिया की शीर्ष दस वैश्विक स्टील कंपनियों में से एक है। यह अन्य देशों में लगभग 50,000 लोगों को रोजगार देती है। एचसीएल टैक्नोलॉजीज, भारत में शीर्ष पांच आईटी कंपनियों में से एक है जिसके 31 देशों में कार्यालय हैं और लगभग 15,000 व्यक्ति विदेश में कार्यरत हैं। डॉरेड्डीज लैबोरेटरीज, शुरू में बड़ी भारतीय कंपनियों को दवा के सामान की आपूर्ति के लिए एक छोटी-सी कंपनी थी, आज इसके दुनिया भर में विनिर्माण संयंत्र और अनुसंधान केन्द्र हैं
स्रोत : www.rediff.com दिनांक 14.10.2014
3.5 वैश्वीकरण
यद्यपि वैश्वीकरण किसी अर्थव्यवस्था का विश्व अर्थव्यवस्था के साथ एकीकरण के रूप में जाना जाता है, जो एक जटिल परिघटना है। यह उन सभी नीतियों का परिणाम है, जिनका उद्देश्य है विश्व को परस्पर निर्भर और अधिक एकीकृत करना। इसके अंतर्गत आर्थिक, सामाजिक और भौगोलिक सीमाओं के अतिक्रमण की गतिविधियों और नेटवर्क का सूजन होता है। वैश्वीकरण ऐसे संपर्क सूत्रों की रचना का प्रयास है, जिससे मीलों दूर हो रही घटनाओं के प्रभाव भारत के घटनाक्रम पर भी स्पष्ट दिखाई देने लगे। यह समग्र विश्व को एक बनाने या सीमामुक्त विश्व की रचना करने का प्रयास है।
बाह्य प्रापण : वैश्वीकरण की प्रक्रिया का यह एक विशिष्ट परिणाम है। इसमें कंपनियाँ किसी बाहरी स्रोत (संस्था) से नियमित सेवाएँ प्राप्त करती हैं, जिन्हें पहले देश के भीतर ही
प्रदान किया जाता था जैसे कि कानूनी सलाह, कंप्यूटर सेवा, विज्ञापन, सुरक्षा आदि। संचार के माध्यमों में आई क्रांति, विशेषकर सूचना प्रौद्योगिकी के प्रसार ने अब इन सेवाओं को ही एक विशिष्ट आर्थिक गतिविधि का स्वरूप प्रदान कर दिया है। इसी कारण, विदेशों से इन सेवाओं को प्राप्त करने (बाह्य प्रापण) की प्रवृत्ति बहुत सशक्त हो गई है। अब तो ध्वनि आधारित व्यावसायिक प्रक्रिया प्रतिपादन, अभिलेखांकन, लेखांकन, बैंक सेवाएँ, संगीत की रिकॉर्डिंग, फिल्म संपादन, पुस्तक शब्दांकन, चिकित्सा संबंधी परामर्श और यहाँ तक कि शिक्षण कार्य भी बाह्य स्रोतों के सुपुर्द किया जाने लगा है। अनेक विकसित देशों की कंपनियाँ भारत की छोटी-छोटी संस्थाओं से ये सेवाएँ प्राप्त कर रही हैं। आधुनिक संचार साधनों के माध्यमों जैसे, इंटरनेट आदि से इन सेवाओं से जुड़ी रचनाओं, ध्वनियों और दृश्यों की जानकारी को तुरंत शून्य से नौ तक की संख्याओं में परिवर्तित कर देश ही

इन्हें कीजिए
नहीं बल्कि महाद्वीपों के बाहर तक प्रसारित कर दिया जाता है। अब तो अधिकांश बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ-साथ अनेक छोटी बड़ी कंपनियाँ भारत से ये सेवाएँ प्राप्त करने लगी हैं, क्योंकि भारत में इस तरह के कार्य बहुत कम लागत में और उचित रूप से निष्पादित हो जाते हैं। भारत की निम्न मजदूरी दरें तथा कुशल श्रम शक्ति की उपलब्धता ने सुधारोपरांत इसे विश्व स्तरीय ‘बाह्य प्रापण’ का एक गंतव्य बना दिया है।
विश्व व्यापार संगठनः व्यापार और सीमा शुल्क महासंधि (GATT) के परवर्ती विश्व व्यापार संगठन (WTO) का गठन 1995 में किया गया। उस महासंधि की रचना विश्व व्यापार प्रशासक के रूप में 23 देशों ने मिलकर 1948 में की थी। उसका ध्येय सभी देशों को विश्व व्यापार में समान अवसर सुलभ कराना था। विश्व व्यापार संगठन का थ्येय ऐसी नियम आधारित व्यवस्था की स्थापना है, जिसमें कोई देश मनमाने ढंग से व्यापार के मार्ग में बाधाएँ खड़ी नहीं कर पाए। साथ ही, इसका थ्येय सेवाओं के सृजन और व्यापार को प्रोत्साहन देना भी है, ताकि विश्व के संसाधनों का इष्टतम स्तर पर प्रयोग हो और पर्यवरण का भी संरक्षण हो सके। विश्व व्यापार संगठन की संधियों में द्विपक्षीय और बहुपक्षीय व्यापार को बढ़ाने हेतु इसमें वस्तुओं के साथ-साथ सेवाओं के विनिमय को भी स्थान दिया गया है। ऐसा सभी सदस्य देशों के प्रशुल्क और अप्रशुल्क अवरोधकों को हटाकर तथा अपने बाज्ञारों को सदस्य देशों के लिए खोलकर किया गया है।
विश्व व्यापार संगठन के एक महत्वपूर्ण सदस्य के रूप में भारत विकासशील विश्व के हितों का संरक्षण करते हुए न्यायपूर्ण विश्वस्तरीय व्यापार व्यवस्था के नियमों तथा सुरक्षात्मक व्यवस्थाओं की रचना में सक्रिय भागीदार रहा है। भारत ने व्यापार के उदारीकरण की अपनी प्रतिबढ़ता को बनाए रखा है। इसके लिए इसने आयात पर से अनेक परिमाणात्मक प्रतिबंध हटाए हैं और प्रशुल्क दरों को भी बहुत कम क्रिया है।
| क्षेत्रक | 1980-91 | 1992-01 | 2002-07 | 2007-12 | 2012-13 | 2013-14 | 2021-22 |
| कृषि | 3.6 | 3.3 | 2.3 | 3.2 | 1.5 | 4.2 | 4.8* |
| उद्योग | 7.1 | 6.5 | 9.4 | 7.4 | 3.6 | 5.0 | 12.7* |
| सेवाएँ | 6.7 | 8.2 | 7.8 | 10.0 | 8.1 | 7.8 | 9.2* |
| कुल योग | 5.6 | 6.4 | 7.8 | 8.2 | 5.6 | 6.6 | 9.4 |
कुछ विद्धानों को आशंका है कि विश्व व्यापार संगठन में भारत की सदस्यता का कोई औचित्य नहीं है, क्योंकि विश्व व्यापार का अधिकांश भाग तो विकसित देशों के बीच ही होता है। उनका यह भी मानना है कि विकसित देश अपने देशों में जहाँ कृषि सहायिकी दिये जाने को लेकर शिकायत करते हैं, वहीं विकासशील देश अपने बाज्ञारों को विकसित देशों के लिए खोले जाने को मजबूर करने को लेकर छला हुआ महसूस करते हैं। वे देश विकासशील देशों को अपने बाज्ञारों में किसी न किसी बहाने प्रवेश करने से रोकने का प्रयास भी करते रहते हैं। क्या आपको ऐसा लगता है कि विश्व व्यापार संगठन तो गरीब देशों को छलने की व्यवस्था मात्र है?

3.6 सुधारकालीन भारतीय अर्थव्यवस्था-एक समीक्षा
अब तो सुधार कार्यक्रम को आरंभ हुए तीन दशक हो चुके हैं। आइए, इस अवधि में भारतीय अर्थव्यवस्था के निष्पादन की समीक्षा करें। अर्थशास्त्री किसी अर्थव्यवस्था की संवृद्धि का मापन सकल घरेलू उत्पाद द्वारा करते हैं। सारणी 3.1 को देखें। 1991 के बाद से भारत में दो दशकों तक सकल घरेलू उत्पाद की लगातार बृद्धि होती रही। सकल घरेलू उत्पाद 1980–91 में 5.6 प्रतिशत से बढ़कर 2021–2022 में 9.4 प्रतिशत हो गई। आर्थिक सुधारों की अवधि में कृषि की बृद्धि में कमी आयी। जहाँ औंद्योगिक क्षेत्रक में उतार-चढ़ाव हुए, वहीं सेवा क्षेत्रक में बृद्धि बढ़ गई। इससे यह पता चलता है कि सकल घरेलू उत्पाद की बृद्धि मुख्यतः सेवा-क्षेत्रक में बृद्धि के कारण हुई है। 2012–15 की

इन्हें कीजिए
मूँगफली आंध्र प्रदेश की एक प्रमुख तेलहन फसल है। आंध्र के अनंतपुर जिले का एक किसान महादेव अपनी आधा एकड़ भूमि पर मूँगफली की खेती पर 10,000 रुपये खर्च किया करता था। इस लागत में बीज, उर्वरक, श्रम, बैलशक्ति और सामान्य हल पर हुए सभी खर्च सम्मिलित होते थे। औसतन महादेव को दो किंवटल उत्पादन प्राप्त हो जाता था, जिसे बेचकर वह 7,000 रुपये प्राप्त कर लेता था। अतः वह 10,000 का खर्च कर 14,000 की कमाई कर लेता था। अनंतपुर जिले में अक्सर अकाल पड़ते रहते थे। आर्थिक सुधारों के बाद तो सरकार ने वहाँ किसी बड़ी सिंचाई योजना पर काम करने का विचार भी नहीं किया। अभी कुछ समय पहले अनंतपुर में मूँगफली की फसल किसी बीमारी की चपेट में आ गई। सरकारी व्यय में कमी के कारण अब उस दिशा में शोध और प्रसार कार्य भी शिथिल हो चुके हैं। महादेव और उसके मित्रों ने कई बार सरकारी अधिकारियों का इस जवाबदेही की ओर ध्यान आकर्षित करने का प्रयास किया, पर उन्हें सफलता नहीं मिल पाई। बीज, उर्वरक आदि पर सहायिका भी घटा दी गई। महादेव की उत्पादन लागतों में इस कारण भी वृद्धि हुई। यहीं नहीं, स्थानीय बाज्ञार में आयात किए गए सस्ते खाद्य तेलों की तो जैसे बाढ़ सी आ गई है- यह आयात प्रतिबंध हटाने का परिणाम है। महादेव अब अपना उत्पादन बाज्ञार में नहीं बेच पाता - बाज्ञार की कीमतें उसकी उत्पादन की लागत को भी पूरा नहीं कर पाती। महादेव जैसे किसान को घाटे को कम करने के लिए क्या करना चाहिए? कक्षा में चरची करें। अवधि में विभिन्न क्षेत्रकों में 1991 के बाद से होने वाली वृद्धि दरों में रुकावट आयी। जहाँ 2013-14 में कृषि की वृद्धि दर में बढ़ोतरी आयी, वहीं 2021-22 में इस क्षेत्रक की वृद्धि दर कम हो गई। सेवा क्षेत्रक में ऊँची वृद्धि दर बनी रही, जो 2007-22 के समग्र सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि से भी अधिक थी। औद्योगिक क्षेत्रक में 2012-13 में तेज गिरावट आई, तत्पश्चात् बाद के वर्षों में बढ़ने लगा।
अर्थव्यवस्था के खुलने से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश तथा विदेशी विनिमय रिज्ञर्व में तेजी से वृद्धि हुई है। विदेशी निवेश (जिसमें प्रत्यक्ष और संस्थागत विदेशी निवेश दोनों ही सम्मिलित हैं) 1990-91 में 100 मिलियन अमेरिकी डॉलर से ऊपर उठकर 2022-23 में 23 बिलियन डॉलर के स्तर पर पहुँच गया है। भारत के विनिमय रिज्ञर्व का आकार भी 1990-91 में 6 बिलियन अमेरिकी डॉलर से बढ़कर 2023-24 में 646 बिलियन डॉलर हो गया है। 2011 में भारत विदेशी विनिमय रिज्ञर्व का सातवाँ सबसे बड़ा धारक माना जाता है।
1991 के बाद से भारत वाहन, कल-पुर्जों, दवा का सामान, इंजीनियरी उत्पादों, सूचना प्रौद्योगिकी उत्पादों और वस्त्रादि के एक सफल निर्यातक के रूप में विश्व बाज्ञार में जम गया है। बढ़ती हुई कीमतों पर भी नियंत्रण रखा गया है।
सुधार कार्यक्रमों द्वारा अपने देश की अनेक मूलभूत समस्याओं का समाधान खोज पाने में विफलता के कारण कड़ी आलोचना भी होती रही है। ये समस्याएँ विशेषकर रोजगार सृजन, कृषि, उद्योग, आधारभूत सुविधाओं के विकास तथा राजकोषीय प्रबंधन से जुड़ी हैं। अभी तक के परीक्षण किए गए साक्थ्यों ने यह दर्शाया है कि पूर्णतः सत्य नहीं है। आपके क्या विचार हैं?
संबृद्धि और रोजगार : यद्यपि सकल घरेलू उत्पाद की संबृद्धि दर में वृद्धि हुई है, फिर भी अनेक विद्वानों ने इस बात पर ध्यान दिलाया है कि सुधार प्रेरित संबृद्धि ने देश में रोजगार के पर्याप्त अवसरों का सृजन नहीं किया है। आपको रोजगार और संबृद्धि के विभिन्न आयामों के अंतर्सबंध अगले अध्याय में विस्तार से समझाए जाएँगे।
कृषि में सुधार : सुधार कार्यों से कृषि को कोई लाभ नहीं हो पाया है और कृषि की संवृद्धि दर कम होती जा रही है।
1991 के बाद से सुधार अवधि में कृषि क्षेत्रक में सार्वजनिक व्यय विशेषकर आधारिक संरचना अर्थात् सिंचाई, बिजली, सड़क निर्माण, बाजार संपर्कों और शोध-प्रसार आदि पर व्यय में काफी कमी आई है (ध्यान रहे कि हरित क्रांति में इसकी महत्यूपूर्ण भूमिका रही थी)। साथ ही, उर्वरक सहायिकी की आंशिक समाप्ति ने भी उत्पादन लागतों को बढ़ा दिया है। इसका छोटे और सीमांत किसानों पर बहुत ही गंभीर प्रभाव पड़ा है। इसके साथ ही, कृषि उत्पादों पर आयात शुल्क में कटौती, कम न्यूनतम समर्थन मूल्यों और इन पदार्थों के आयात पर परिमाणात्मक प्रतिबंध हटाए जाने के कारण इस क्षेत्रक की नीतियों में कई परिवर्तन हुए। इसके कारण भारत के किसानों को विदेशी स्पर्धा का भी सामना करना पड़ा है, जिसका उन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।
दूसरी तरफ, उत्पादन व्यवस्था निर्यातोन्मुखी हो रही है। आंतरिक उपभोग की खाद्यान्न फसलों
उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण-एक समीक्षा के स्थान पर निर्यात के लिए नकदी फसलों पर बल दिया जा रहा है। इससे देश में खाद्यान्नों की कीमतों पर द्बाव बढ़ रहा है।
उद्योगों में सुधार : औद्योगिक संवृद्धि की दर में भी कुछ शिथिलता आई है। यह औद्योगिक उत्पादों की गिरती हुई माँँग के कारण है। माँँग में गिरावट के कई कारण हैं जैसे, सस्ते आयात, आधारित संरचना में अपर्याप्त निवेश आदि। वैश्वीकरण की व्यवस्था में विकासशील देश अपनी अर्थव्यवस्थाओं को विकसित देशों की वस्तुओं और पूँजी प्रवाहां को प्राप्त करने के लिए खोल देने को बाध्य हुए हैं तथा उन्होने अपने उद्योगों का आयतित वस्तुओं से प्रतिस्पर्धा का खतरा मोल ले लिया। सस्ते आयातों ने घरेलू वस्तुओं की माँँग को प्रतिस्थापित कर दिया है। निवेश में कटौती के कारण, बिजली सहित, आधारिक संरचनाओं की पूर्ति अपर्याप्त ही बनी हुई है। इसी कारण, प्रायः यह समझा जा रहा है कि विदेशियों के माल में बेरोक-टोक आवागमन को सहज बनाकर गरीब देशों के स्थानीय उद्योगों और रोजगार की संभावनाओं के लिए वैश्वीकरण पूरी तरह से बर्बाद करने वाली परिस्थितियों की रचना कर रहा है।
यही नहीं, भारत जैसे गरीब देशों को अभी विकसित देशों में विद्यमान उच्च अप्रशुल्क अवरोधकों के कारण उनके बाज्ञारों में प्रवेश के उपयुक्त अवसर भी नहीं मिल पा रहे हैं। यद्यपि भारत में वस्त्र-परिधान आदि के व्यापार से सभी कोटा आदि के प्रतिबंध हटा दिए हैं, पर अभी भी संयुक्त राज्य अमेरिका ने भारत और चीन से इनके आयातों से अपने कोटा प्रतिबंध नहीं हटाए हैं।
विनिवेश : प्रतिवर्ष सरकार सार्वजनिक उद्यमों में विनिवेश के कुछ लक्ष्य निर्धारित करती है। वर्ष 1991–92 में उसने विनिवेश द्वारा 2500 करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य रखा था। सरकार उस लक्ष्य से 3040 करोड़ अधिक जुटा पाने में सफल रही। 2022–23 में सरकार लगभग 46,000 करोड़ रुपये जुटाने में सक्षम रही। इस प्रक्रिया के आलोचकों का कहना है कि सार्वजनिक उपक्रमों
बॉक्स 3.3 'सिरीसिला त्रासदी'
विद्युत क्षेत्र में सुधार बहुत से भारतीय राज्य में नहीं हुये हैं। उन्हें अनुदानित दरों पर बिजली की पूर्ति नहीं की जा रही है। बल्कि बिजली की दरों में बढ़ोतरी ही हुई है। इसका प्रभाव लघु उद्योगों में काम करने वाले मजदूरों पर पड़ा है। इसका एक उदाहरण आंधप्रदेश का हथकरघा उद्योग है। इन उद्योगों में काम कर रहे बुनकरों की मजदूरी बुने गए कपड़े की मात्रा पर आधारित होती है। अतः बिजली में कटौती का अर्थ ऊँची दरों की मार झेल रहे बुनकरों की मजदूरी में भी कटौती है। इससे तो बुनकरों की अजीविका ही संकट में पड़ गई। कुछ वर्षों पहले आंध्र के एक छोटे से कस्बे सिरीसीला में विद्युत करघों पर काम करने वाले 50 बुनकरों को आत्महत्या करने को बाध्य होना पड़ा।
क्या बिजली की दरें नहीं बढ़ानी चाहिए?
सुधारों से प्रभावित लघु उद्योगों को पुनःचालू करने के लिए आप क्या सुझाव देंगे?
की परिसंपत्तियों को औने-पौने दामों में निजी व्यापारियों को बेचा जा रहा है। दूसरे शब्दों में, इस प्रक्रिया से सरकार को बहुत घाटा उठाना पड़ रहा है और सार्वजनिक संपत्ति की एकमुश्त बिक्री करनी पड़ रही हैं। साथ ही, विनिवेश से प्राप्त राशि का उपक्रमों के विकास के लिए प्रयोग नहीं किया गया, न ही इसे सामाजिक आधारिक संरचनाओं के निर्माण पर खर्च किया गया। यह राशि सरकार के बजट के राजस्व घाटे को कम करने में ही लग गई। क्या आप सोचते हैं कि सरकारी कंपनियों की कार्य कुशलता में सुधार लाने का सबसे अच्छा रास्ता उनकी परिसंपत्तियों के हिस्सों को बेचना है?
सुधार और राजकोषीय नीतियाँ : आर्थिक सुधारों ने सामाजिक क्षेत्रकों में सार्वजनिक व्यय की वृद्धि पर विशेष रूप से रोक लगा दी है। इस अवधि में कर घटाकर और कर वंचना नियांत्रित कर राजस्व संग्रह बढ़ाने की नीतियों के यथोचित सकारात्मक प्रभाव भी नहीं मिल पाए हैं। यही नहीं, सीमाशुल्क दरों में कटौती तो सुधार कार्यों का आवश्यक अंग है। अतः उन दरों को बढ़ाकर अधिक राजस्व जुटाने का मार्ग बंद हो चुका है। विदेशी निवेश आकर्षित करने के लिए निवेशकों को कई प्रकार के कर प्रोत्साहन दिए गए हैं, इससे भी कर राजस्व को बढ़ा पाने की संभावनाएँ क्षीण हो गई हैं। इन सबका विकास और जनकल्याण आदि पर होने वाले व्यय पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।
3.7 निष्कर्ष
उदारीकरण और निजीकरण की नीतियों के माध्यम से वैश्वीकरण के भारत सहित अनेक देशों पर सकारात्मक तथा नकारात्मक प्रभाव पड़े है। कुछ विद्धानों का विचार है कि वैश्वीकरण को एक सुअवसर की भॉँति देखा जाना चाहिए क्योंकि विश्व बाज्ञारों में बेहतर पहुँच तथा तकनीकी उन्नयन द्वारा विकासशील देशों के बड़े उद्योगों को अंतरीष्ट्रीय स्तर पर ‘महत्वपूर्ण’ बनने का अवसर प्रदान कर रहा है।
दूसरी ओर, आलोचकों का मत है कि वैश्वीकरण तो अमीर देशों द्वारा विकासशील देशों के आंतरिक बाज्ञारों पर कब्जा करने की साजिश है। इनके अनुसार, वैश्वीकरण से गरीब देशवासियों का कल्याण ही नहीं वरन् उनकी पहचान भी खतरे में पड़ गई है। यह भी बताया जा रहा है कि बाज्ञार प्रेरित वैश्वीकरण से विभिन्न देशों और जन समुदायों के बीच की खाई और विस्तृत हो रही है।
भारतीय परिप्रेक्ष्य में किए गए अनेक अध्ययनों का निष्कर्ष है कि भारत के 1990 का वित्तीय संकट उसकी आंतरिक संरचना में कई भीषण विषमताओं का ही परिणाम था। उस संकट के निदान के लिए बाहरी शक्तियों के परामर्श पर सरकार द्वारा प्रारंभ नीतियों ने उन विषमताओं को और भी गहन बना दिया है। इन्हॉने केवल उच्च आयवर्ग की आमद्नी और उपभोग स्तर का उन्नयन किया है तथा सारी संवृद्धि कुछ इने-गिने क्षेत्रों तक सीमित रही है। ये क्षेत्र हैं- दूरसंचार, सूचना प्रौद्योगिकी, वित्त, मनोरंजन, पर्यटन और परिचिया सेवाएँ, भवन निर्माण और व्यापार आदि। कृषि, विनिर्माण जैसे आधारभूत क्षेत्रक (जो देश के करोड़ों लोगों को रोजगार प्रदान करते हैं) इन सुधारों से लाभान्वित नहीं हो पाए हैं।

पुनरावर्तन
1. इस सारणी में 2011-12 के कीमत स्तर पर सकल घरेलू उत्पाद की संवृद्धि दर के ऑँकड़े दिए गए है। आपने अर्थशास्त्र के लिए सांख्यिकी विश्लेषण में ऑँकड़ों की प्रस्तुति की तकनीकों का अध्ययन किया है। इस सारणी के ऑँकड़ों का प्रयोग कर एक रेखीय आरेख अंकित कर उसका निर्वचन करें।
| वर्ष | स.घ.उ. संवृद्धि दर(%) |
| 2012-13 | 5.5 |
| 2013-14 | 6.4 |
| 2014-15 | 7.5 |
| 2015-16 | 8.0 |
| 2016-17 | 8.3 |
| 2017-18 | 6.8 |
| 2018-19 | 6.5 |
| 2019-20 | 3.9 |
| 2020-21 | -5.8 |
| 2021-22 | 9.4 |
2. अपने आस-पास ध्यान दें : आप के विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में बिजली की पूर्ति राज्य विद्युत मंडल और अनेक निजी कंपनियाँ कर रही होंगी। सरकारी बस सेवा के साथ-साथ निजी बसें भी सडकों पर दौड़ती दिखाई देती हैं।
3. अपने अभिभावकों और दादा-नाना के समवयस्कों की सहायता से उन बहुराष्ट्रीय कंपनियों की सूची बनाएँ, जो स्वतंत्रता के समय भारत में काम कर रही थी। उनमें से जो अभी भी यहाँ पर हैं उनके सामने (✓) तथा जो अब नहीं है उनके सामने (X) का चिह्न अंकित करें। क्या ऐसी कंपनियाँ भी हैं, जिन्होंने अपने नाम बदल लिए हों? नए नाम, उद्धम के देश, उत्पाद की प्रकृति और उनके शब्द चिहां की जानकारी एकत्र कर चार्ट तैयार करें और कक्षा में प्रदर्शित करें।
4. इनके उपयुक्त उदाहरण दें।
| उत्पाद की प्रक्ति | किसी विदेशी कंपनी का नाम |
| बिस्कुट | |
| जूते | |
| कंघ्यूटर | |
| कारें | |
| टेलिविजन और रेफ्रिजरेटर | |
| लेखन सामग्री |
यह भी पता करें कि क्या ये कंपनियाँ 1991 से पहले भी भारत में काम कर रही थीं या नई आर्थिक नीति के बाद ही इनका आगमन हुआ है। इसके लिए अपने शिक्षकों, अभिभावकों, दादा-दादी और दुकानदारों की सहायता ले सकते हैं।

संदर्भ पुस्तकें
आचार्य शंकर 2003. इंडियाज इकॉनोमीः सम इश्यूज एंड आनसर्ज, एकेडेमिक फाउंडेशन, नयी दिल्ली।
आल्टरनेटिव सर्वे ग्रुप 2005. आल्टरनेटिव इक्नॉमिक सर्वे, इंडिया 2004-05, डिसइक्विलाइजिंग ग्रोथ, दानिश बुक्स दिल्ली।
अहलूवालिया, आई.जे.एंड आठ.एम.डी. लिटिल, 1998. इंडियान इकॉनौमिक रिफोर्मस एंड डेवलमंट, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, नयी दिल्ली।
बर्धन प्रनव 1998. द पाँलिटिकल इकॉनामी ऑफ डेवलपमेंट इन इंडिया, एक्सपंडेड एडीसन विथ एन ऐपीलांग ओन द पाँलिटिकल इकोनोमी ऑफ रिफार्म इन इंडिया, ऑक्सफोर्ड यूनीवर्सिटी प्रेस, दिल्ली।
