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Unit8

भारत का संविधान - नागरिकों के मूल कर्तव्य

भारतीय अमाज

कक्षा 12 के लिए समाजशास्त्र की पाठ्यपुस्तक

12112
12112
विद्यया S मृतमर्शनुतेएनसीई आर टीNCERT
विद्यया S मृतमर्शनुतेएनसीई आर टीNCERT

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद्

NATIONAL COUNCIL OF EDUCATIONAL RESEARCH AND TRAINING

12112- भारतीय समाज

कक्षा 12 के लिए समाजशास्त्र की पाठ्यपुस्तक

ISBN 81-7450-721-3

प्रथम संस्करण

मार्च 2007 चैत्र 1929

पुनर्मद्रण

नवंबर 2007, जनवरी 2009, जनवरी 2010, दिसंबर 2010, जनवरी 2012, जनवरी 2013, नवंबर 2013, जनवरी 2016, फरवरी 2017, दिसंबर 2017, जनवरी 2019, फरवरी 2020 और मार्च 2021

संशोधित संस्करण

अक्तूबर 2022 कार्तिक 1944

पुनर्मुद्रण

मार्च 2024 चैत्र 1946 जनवरी 2025 पौष 1946 दिसंबर 2025 अग्रहायण 1947

PD 15T BS

© राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद्, 2007, 2022

₹ 110.00

एन.सी.ई.आर.टी. बाटरमार्क 80 जी.एस.एम. पेपर पर मुद्रिता प्रकाशन प्रभाग में सचिव, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद्, श्री अरविंद मार्ग, नई दिल्ली 110 016 द्वारा प्रकाशित तथा शिवम इंटरप्राईजेज, ई-49, सेक्टर ए-5/6, ट्रोनिका सिटी, गाजियाबाद, पिन-201103 द्वारा मुद्रित।

सर्वाधिकार सुरक्षित

•
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•
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•
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गुबाहाटी 781 021फ्रोन : 0361-2676869

प्रकाशन सहयोग

अध्यक्ष, प्रकाशन प्रभाग :एम.वी. श्रीनिवासन
मुख्य संपादक :बिज्ञान सुतार
मुख्य व्यापार प्रबंधक :अमिताभ कुमार
मुख्य उत्पादन अधिकारी (प्रभारी) :दीपक जैसवाल
संपादक :रेखा अग्रवाल
सहायक उत्पादन अधिकारी :दीपक कुमार

आवरण एवं लेआउट

श्वेता गाव

चित्राकन

निधि वाधवा

काटोंग्राफ़ी

काटोग्राफ्पिक डिजाइन्स

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (2005) सुझाती है कि बच्चों के स्कूली जीवन को बाहर के जीवन से जोड़ा जाना चाहिए। यह सिद्धांत किताबी ज्ञान की उस विरासत के विपरीत है जिसके प्रभाववश हमारी व्यवस्था आज तक विद्यालय और घर के बीच अंतराल बनाए हुए है। नई राष्ट्रीय पाठ्यचर्या पर आधारित पाठ्यक्रम और पाठ्यपुस्तकें इस बुनियादी विचार पर अमल करने का प्रयास है। इस प्रयास में हर विषय को एक मजबूत दीवार से घेर देने और जानकारी को रटा देने की प्रवृत्ति का विरोध शामिल है। आशा है कि ये कदम हमें राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1986) में वर्णित बाल-केंद्रित व्यवस्था की दिशा में काफ्री दूर तक ले जाएँगे।

इस प्रयत्न की सफलता अब इस बात पर निर्भर है कि विद्याल्यों के प्राचार्य और अध्यापक बच्चों की कल्पनाशील गतिविधियों और सवालों की मदद से सीखने और सीखने के दौरान अपने अनुभवों पर विचार करने का कितना अवसर देते हैं। हमें यह मानना होगा कि यदि जगह, समय और आज्ञादी दी जाए तो बच्चे बड़ों द्वारा सौपी गई सूचना-सामग्री से जुड़कर और जूझकर नए ज्ञान का सूजन करते हैं। शिक्षा के विविध साधनों एवं स्रोतों की अनदेखी किए जाने का प्रमुख कारण पाठ्यपुस्तक को परीक्षा का एकमात्र आधार बनाने की प्रवृत्ति है। सर्जना और पहल को विकसित करने के लिए जस्थरी है कि हम बच्चों को सीखने की प्रक्रिया में पूरा भागीदार मानें और बनाएँ, उन्हें ज्ञान की निर्धारित खुराक का ग्राहक मानना छोड़ दें।

ये उद्देश्य स्कूल की दैनिक जिंदगी और कार्यशैली में काफ्री फेरबदल की माँग करते हैं। दैनिक समय-सारणी में लचीलापन उतना ही जरूरी है जितनी वार्षिक कैलेंडर के अमल में चुस्ती, जिससे शिक्षण के लिए नियत दिनों की संख्या हकीकत बन सके। शिक्षण और मूल्यांकन की विधियाँ भी इस बात को तय करेंगी कि यह पाठ्यपुस्तक विद्यालय में बच्चों के जीवन को मानसिक दबाव तथा बोरियत की जगह खुशी का अनुभव कराने में कितनी प्रभावी सिब्ध होती है। बोझ की समस्या से निपटने के लिए पाठ्यक्रम निर्माताओं ने विभिन्न चरणों में ज्ञान का पुनर्निधरिण करते समय बच्चों के मनोविज्ञान एवं अध्यापन के लिए उपलब्ध समय का ध्यान रखने की पहले से अधिक सचेत कोशिश की है। इस कोशिश को और गहराने के यत्न में यह पाठ्यपुस्तक सोच-विचार और विस्मय, छोटे समूहों में विचार-विमर्श और ऐसी गतिविधियों को प्राथमिकता देती है जिन्हें करने के लिए व्यावहारिक अनुभवों की आवश्यकता होती है।

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् इस पुस्तक की रचना के लिए बनाई गई पाठ्यपुस्तक निर्माण समिति के परिश्रम के लिए कृतज्ञता व्यक्त करती है। परिषद् सामाजिक विज्ञान पाठ्यपुस्तक सलाहकार समिति के अध्यक्ष प्रोफेसर हरि वासुदेवन और इस पाठ्यपुस्तक समिति के मुख्य सलाहकार प्रोफेसर योगेंद्र सिंह की विशेष आभारी है। इस पाठ्यपुस्तक के विकास में कई शिक्षकों ने योगदान किया, इस योगदान को संभव बनाने के लिए हम उनके प्राचायों के आभारी हैं। हम उन सभी संस्थाओं और संगठनों के प्रति कृतज्ञ हैं जिन्होंने अपने संसाधनों, सामग्री और सहयोगियों की मदद लेने में हमें उदारतापूर्वक सहयोग दिया। हम माध्यमिक एवं उच्च शिक्षा विभाग, मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा प्रोफेसर मृणाल मीरी एवं प्रोफेसर जी.पी. देशपांडे की अध्यक्षता में गठित निगरानी समिति (मॉनिटरिंग कमेटी) के सदस्यों को अपना मूल्यवान समय और सहयोग देने के लिए धन्यवाद देते हैं। व्यवस्थागत सुधारों और अपने प्रकाशनों में निरंतर निखार लाने के प्रति समर्पित राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् टिप्पणियों एवं सुझावों का स्वागत करेगी जिनसे भावी संशोधनों में मदद ली जा सके।

निदेशक

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान

और प्रशिक्षण परिषद्

नयी दिल्ली

20 नवंबर 2006

पाठ्यपुस्तकों में पाठ्य सामग्री का पुनर्स्योजन

कोविड-19 महामारी को देखते हुए, विद्यार्थियों के ऊपर से पाठ्य सामग्री का बोझ कम करना अनिवार्य है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 में भी विद्यार्थियों के लिए पाठ्य सामग्री का बोझ कम करने और रचनात्मक नजरिए से अनुभवात्मक अधिगम के अवसर प्रदान करने पर जोर दिया गया है। इस पृष्ठभूमि में, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् ने सभी कक्षाओं में पाठ्यपुस्तकों को पुनर्स्योजित करने की शुरुआत की है। इस प्रक्रिया में रा.शौ.अ.प्र.प. द्वारा पहले से ही विकसित कक्षावार सीखने के प्रतिफलों को ध्यान में रखा गया है।

पाठ्य सामग्रियों के पुनर्स्योजन में निम्नलिखित बिंदुओं को ध्यान में रखा गया है -

•
एक ही कक्षा में अलग-अलग विषयों के अंतर्गत समान पाठ्य सामग्री का होना;
•
एक कक्षा के किसी विषय में उससे निचली कक्षा या ऊपर की कक्षा में समान पाठ्य सामग्री का होना;
•
कठिनाई स्तर;
•
विद्यार्थियों के लिए सहज रूप से सुलभ पाठ्य सामग्री का होना, जिसे शिक्षकों के अधिक हस्तक्षेप के बिना, वे खुद से या सहपाठियों के साथ पारस्परिक रूप से सीख सकते हों;
•
वर्तमान संदर्भ में अप्रासंगिक सामग्री का होना।

वर्तमान संस्करण, ऊपर दिए गए परिवर्तनों को शामिल करते हुए तैयार किया गया पुनर्स्योजित संस्करण है।

इस पाठ्यपुस्तक का उपयोग

कक्षा 12 के लिए समाजशास्त्र की दो पाठ्यपुस्तकों में यह पहली पुस्तक आपके हाथों में है। इसका मूल उद्देश्य है राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 के नए मार्गदर्शिक सिद्धांतों को क्रियान्वित करना। साथ ही यह पुस्तक राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् द्वारा अपनाई गई समाजशास्त्र विषय के पाठ्यक्रम के खास लक्ष्यों तक पहुँचने का प्रयास भी करती है (बॉक्स 1 देखें)।

बॉक्स 1: राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् 2005 के समाजशास्त्र पाठ्यक्रम के लक्ष्य

•
☐ छात्रों को कक्षा की पढ़ाई को अपने परिवेश से जोड़ने में मदद करना;
•
☐ समाजशास्त्र के बुनियादी प्रत्ययों से छात्रों का परिचय कराना ताकि वे सामाजिक जीवन को देख-समझ सकें;
•
☐ छात्रों को सामाजिक प्रक्रियाओं की जटिलता से अवगत कराना;
•
☐ छात्रों में भारतीय समाज एवं पूरे विश्व की सामाजिक-सांस्कृतिक विविधता के प्रति सम्मान जगाना;
•
☐ छात्रों में समकालीन भारतीय समाज में हो रहे परिवर्तनों की विश्लेषणात्मक परख विकसित करना।

भारतीय समाज कक्षा 11 के दो पाठ्यक्रमों की विषयवस्तु को आगे बढ़ाती है व कक्षा 12 में समाजशास्त्र की दूसरी पुस्तक भारत में सामाजिक परिवर्तन एवं विकास का साथ देती है। इस पुस्तक के अध्यायों तथा राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् के पाठ्यक्रम के संबंध को बॉक्स 2 में स्पष्ट किया गया है।

बॉक्स 2: राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् के समाजशास्त्र के पाठ्यक्रम के साथ संगतता

(पाठ्यक्रम के विषय से संबंधित इस पाठ्यपुस्तक के अध्याय एवं अनुभाग प्रत्येक पाठ्यक्रम अनुभाग के साथ कोष्ठक में दिए गए हैं)

यूनिट I : भारतीय समाज की संरचना

•
1.1 भारतीय समाज: एक परिचय (अध्याय 1; 4.1 में ‘उपनिवेशवाद और नए बाजारों का आविर्भाव’; 6.1 में ‘समुदाय, राष्ट्र एवं राष्ट्र-राज्य’)
•
1.2 जनसांख्यिकीय संरचना (अध्याय 2)
•
1.3 ग्रामीण-नगरीय विभिन्नताएँ एवं संयोजन (अध्याय 2.6; 4.1 में 'साप्ताहिक आदिवासी बाज्ञार' वाला अनुभाग)

यूनिट II : सामाजिक संस्थाएँ : निरंतरता एवं परिवर्तन

•
2.1 परिवार एवं नातेदारी (अध्याय 3.3, अध्याय 5.3)
•
2.2 जाति व्यवस्था (अध्याय 3.1; 4.1 में 'जाति आधारित बाजार एवं व्यापारिक तंत्र'; अध्याय 5.2)
•
2.3 जनजातीय समाज (अध्याय 3.2; 4.1 में 'साप्ताहिक आदिवासी बाजार' वाला अनुभाग)
•
2.4 बाजार एक सामाजिक संस्था के रूप में (अध्याय 4)

यूनिट III : सामाजिक विषमता एवं बहिष्कार

•
3.1 जातिगत पूर्वाग्रह, अनुसूचित जातियाँ एवं अन्य पिछड़े वर्ग (अध्याय 5.1, 5.2)
•
3.2 जनजातीय समुदायों की उपेक्षा (अध्याय 5.1, 5.2)
•
3.3 महिलाओं की समानता के लिए संघर्ष (अध्याय 5.3, अध्याय 3.3)
•
3.4 धार्मिक अल्पसंख्यकों का संरक्षण (अध्याय 6.1, 6.3)
•
3.5 अन्यथा सक्षम लोगों की देखभाल (अध्याय 5.4)

यूनिट IV : विविधता में एकता की चुनौतियाँ

•
4.1 संप्रदायवाद, क्षेत्रवाद एवं जातिवाद (अध्याय 6, अध्याय 5.1, 5.2)
•
4.2 बहुविध एवं असमान समाजों में राज्य की भूमिका (अध्याय 6, 6.1, अध्याय 5.1, 5.2)
•
4.3 हमारी समानताएँ (अध्याय 6, 6.1, 6.4)

यूनिट V : परियोजना कार्य (अध्याय 7)

इस पुस्तक के उपयोग संबंधी सुझाव

जैसाकि बताया जा चुका है यह पुस्तक राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा के मूल भाव को व्यक्त करती है। इस रूपरेखा में बच्चों पर पाठ्यक्रम के और खासकर तथ्यात्मक जानकारी की पुनप्रस्तुति के बोझ को कम करने पर जोर दिया गया है। इसके अलावा विषयवस्तु को आज के सामाजिक वातावरण और किशोरों के दैनिक जीवन से जोड़ने का प्रयास किया गया है। ऐसा करने के लिए पाठ्यपुस्तक में दी गई सामग्री व उसकी प्रस्तुति के साथ-साथ कक्षा में पाठ्यपुस्तक के प्रयोग की विधि में भी बदलाव अनिवार्य है। बेशक हर विद्यालय और हर कक्षा में शिक्षक व छात्र इस पुस्तक से काम लेने के अपने-अपने तरीके विकसित करेंगे। लेकिन इसके बावजूद यह सच है कि सामान्यतः नयी पाठ्यचर्या की रूपरेखा के तहत तथ्यों को रटकर दोहराने की प्रक्रिया को कम और परिचर्चा, क्रियाकलाप व प्राकल्प जैसी प्रक्रियाओं को अधिक महत्च दिया जाएगा।

उपरोक्त परिवर्तन राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 की उन सामान्य विशेषताओं में से एक है जो सभी विषयों की शैक्षणिक पढ़ति को प्रभावित करेंगे। लेकिन इनके अलावा इस पाठ्यपुस्तक की विषयवस्तु से संबंधित कुछ खास मुद्दे ऐसे भी हैं जिनके लिए अलग से तैयारी करनी होगी। कुछ सुस्पष्ट उदाहरण अध्याय 3, 5 और 6 में हैं जिनमें जाति व अन्य प्रकार की विषमताओं व अल्पसंख्यक समुदायों से संबंधित विषयों का जिक्र है। हर शिक्षक को अपनी कक्षा की सामाजिक संरचना को ध्यान में रखते हुए इन संवेदनशील विषयों को किसी भी समुदाय के छात्रों को ठेस पहुँचाए बिना पढ़ाने के उपाय ढॉढ़ने होंगे। लेकिन साथ-साथ यह भी जरूरी है कि संपन्न-समृढ्ध समुदायों के छात्रों को भी अपनी सहज-सामान्य मान्यताओं व मतों पर पुनर्विचार करने को प्रोत्साहित किया जाए। कुछ इन्हीं कारणों से अध्याय 3 में गतिविधियों की संख्या कम रखी गयी है। आशा है कि शिक्षकगण अपनी कक्षाओं की विशिष्ट परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए उपर्युक्त गतिविधियाँ बनाएँगे।

इस अपवाद को छोड़कर बाकी पुस्तक में गतिविधियों का भरपूर प्रयोग किया गया है। गतिविधियाँ इस पाठ्यपुस्तक का अभिन्न अंग हैं; इन्हें सुविचारित व योजनाबढ्ध तरीके से विषयवस्तु में सम्मिलित किया गया है। शिक्षक व छात्रचाहें तो शौक से इन गतिविधियों में Fेरबदल कर सकते हैं। कृपया इन्हें खारिज न करें, संशोधित रूप में ही सही लेकिन इन्हें करवाएँ जरूर - यही हमारी विनती है। गतिविधियाँ कई प्रकार की हैं। एक नए प्रकार की गतिविधि को ‘अभ्यास’ कहा गया है। ‘अभ्यास’ पुस्तक में दिए गए किसी खास उढ्धरण अथवा तालिका पर आधारित हैं, और इनमें छात्रों से अपेक्षा की जाती है कि वे सटीक सवालों के सटीक जवाब दें। अभ्यास को अनिवार्य माना जाना चाहिए; इन्हें कक्षा में अवश्य कराएँ। इनके अलावा पुस्तक में अतिरिक्त जानकारी देने वाले ‘सूचना बॉक्स’ भी हैं। यह जानकारी छात्रों के ज्ञानवर्धन व बेहतर समझ के लिए दी गई हैं और परीक्षा में इन पर सीधे सवाल नहीं पूछे जाएँगे। इस पुस्तक में सूचना बॉक्स रंगीन हैं (यानी गैर-स्लेटी रंगों के सभी बॉक्स सूचना बॉक्स हैं)।

पुस्तक की विषयवस्तु भारी भरकम न लगे इसलिए हमने संदर्भ-सूची को सीमित रखा है। हर अध्याय के अंत में दी गई संदर्भ-सूची में उबृत ग्रंथों के अलावा विषयवस्तु पर आगे पढ़ने के लिए सुझाव शामिल हैं। शिक्षकगण अगर दी गई संदर्भ-सूची से हटकर अन्य उपयोगी संदर्भ सुझाना चाहें तो इसका स्वागत है। आप ऐसे सुझाव हमें भी भेजें (पता नीचे दिया गया है)। पुस्तक के अंत में एक समग्र शब्दावली उपलब्ध है- छात्रों को इसकी मदद लेने के लिए प्रोत्साहित करें। जिन शब्दों को पुस्तक के मूल पाठों में विस्तार से समझाया गया है वे प्रायः: शब्दावली में नहीं हैं, लेकिन यह याद रहे कि मोटे अक्षरों में छपे सभी शब्दों के अलावा शब्दावली में और भी बहुत सारे शब्द हैं।

दो शब्द प्राकल्प व प्रयोगात्मक कार्य परा। यह एक नयी पहल है जिसका मूल्यांकन पर महत्वपूर्ण असर पड़ेगा क्योंकि प्राकल्पों पर बीस प्रतिशत अंक दिए जाएँगे (अर्थात् वार्षिक परीक्षा केवल 80 अंकों की होगी)। अतः प्राकल्पों को गंभीरता से लेना होगा तथा इन्हें पूरी लगन के साथ करना-करवाना होगा। अध्याय 7 में प्राकल्पों के विषय में कुछ सुझावों के अलावा कक्षा 11 की पाठ्ट्यपुस्तक (समाजशास्त्र एक परिचय, अध्याय 5) की शोध प्रणाली संबंधी चर्चा का सारांश भी दिया गया है। प्राकल्पों को पूरा करने में काफ़ी समय लगेगा, इसलिए यह अनिवार्य है कि इन्हें पाठ्यक्रम के प्रारंभिक दौर में ही शुरू करवा दिया जाए। इस पुस्तक के अध्याय 2 व 3 के बाद प्राकल्पों पर ध्यान दिया जाना चाहिए और छात्रों को अपने-अपने प्राकल्पों का विषय निर्धारित कर लेना चाहिए। सभी अध्यायों को पढ़ा लेने तक इंतजार न करों। पाठ्यक्रम के अंत में भी अध्याय 7 को दोबारा पढ़ा जा सकता है। इस अध्याय में दिए गए सुझाव, सुझाव मात्र है। आप अन्य उपर्युक्त विषयों पर भी प्राकल्प कर या करवा सकते हैं, लेकिन ऐसा करते समय अध्याय 7 में दिए गए शोध प्रणाली व शोध कार्य संबंधित व्यावहारिक एवं सैढ़ांतिक समस्याओं को अवश्य ध्यान में रखें।

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् द्वारा राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 के सरोकारों को साकार करने का यह प्रथम प्रयास है। हम जानते हैं कि इस पाठ्यपुस्तक को कई तरह से सुधारा जा सकता है। हमें पूरा विश्वास है कि आने वाले साल में शिक्षक व छात्र अपने सुझाव भेजकर इस पुस्तक को बेहतर बनाने में हमारी मदद करेंगे। हमें आपकी प्रतिक्रियाओं व समीक्षात्मक टिप्पणियों का ही नहीं, बल्कि पुस्तक की साज सज्जा व ग्रंथकार संबंधी सुझावों का भी इंतजार है। हम वादा करते हैं कि सभी उपयोगी सुझावों को इस पाठ्यपुस्तक के अगले संस्करण में साभार प्रकाशित करेंगे।

कृपया इस पते पर लिखेंः:

विभागाध्यक्ष,

सामाजिक विज्ञान शिक्षा विभाग,

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद्

श्री अरविंद मार्ग, नयी दिल्ली-110016

ई:मेल द्वारा संपर्क के लिए इस पते पर लिखें: [email protected]

भारत का संविधान

उहेशिका

हम, भारत के लोग, भारत को एक ¹[संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य] बनाने के लिए, तथा उसके समस्त नागरिकों को :

सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय,

विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म

और उपासना की स्वतंत्रता,

प्रतिष्ठा और अवसर की समता

प्राप्त कराने के लिए,

तथा उन सब में

व्यक्ति की गरिमा और ²[राष्ट्र की एकता

और अखंडता] सुनिश्चित करने वाली बंधुता

बढ़ाने के लिए

दृढ़संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवंबर, 1949 ई. को एतद्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।

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पाठ्यपुस्तक निर्माण समिति

अध्यक्ष, सामाजिक विज्ञान पाठ्यपुस्तक सलाहकार समिति

हारि वासुद्देवन, प्रोफ्रेसर, इतिहास विभाग, कलकता विश्वविद्यालय, कोलकाता।

मुख्य सलाहकार

योगेंद्र सिंह, प्रोफ्रेसर एमेरेटिस, सेंटर फॉर द सोशल सिस्ट्रमस, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नयी दिल्ली।

सलाहकार

सतीश देशपांडे, प्रोफेसर, समाजशास्त्र विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली।

मैत्रेयी चौधरी, प्रोफ्रेसर, सेंटर फॉर द सोशल सिस्ट्रमस, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नयी दिल्ली।

सदस्य

अमिता बाविसकर, प्रोफेसर, इंस्टीट्यूट ऑफ़ इकोनॉमिक ग्रोथ, दिल्ली।

अंजन घोष, फैलो, सेंटर फॉर स्ट्डीज़ इन सोशल साइंसेस, कोलकाता।

कैरल उपाध्याय, फैलो, नेशनल इस्टीट्यूट ऑफ़ एडवांस स्ट्डीज, बैंगलोर।

खमयमबम इंदिरा, असिस्टेंट प्रोफेसर, नार्थ ईस्ट रीजनल इंस्टीट्यूट ऑफ एजुकेशन, रा.शौ.अ.प्र.प., शिलांग।

कुशल देब, प्रोफ्रेसर, सामाजिक विज्ञान एवं मानविकी शिक्षा विभाग, आई. आई. टी., मुंबई।

मंजु भह, प्रोफ्रेसर, सामाजिक विज्ञान शिक्षा विभाग, रा.शै.अ.प्र.प., नयी दिल्ली।

तसॉंगवाई न्यूमई, असिस्टेंट प्रोफ्रेसर, नार्थ इस्ट रीजनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ एजुकेशन, रा.शै.अ.प्र.प., शिलांग।

हिंदी अनुवाद

परशुराम शर्मा, भूतपूर्व निदेशक (राजभाषा), भारत सरकार।

रवि नंदन सिंह, असिस्टेंट प्रोफ्रेसर, समाजशास्त्र विभाग, हिंदू महाविद्यालय, दिल्ली।

सुषमा, असिस्टेंट प्रोफेसर, समाजशास्त्र विभाग, अदिति महाविद्यालय, बवाना, दिल्ली।

सारिका चंद्रवंशी साजू, असिस्टेंट प्रोफ्रेसर, आर. आई. ई., रा.शै.अ.प्र.प., भोपाल।

सदस्य समन्वयक

सारिका चंद्रवंशी साजू, असिस्टेंट प्रोफ्रेसर, आर. आई. ई., रा.शौ.अ.प्र.प., भोपाल।

आभार

इस पाठ्यपुस्तक के निर्माण में अनेक व्यक्तियों के सहयोग के लिए हम आभार व्यक्त करते हैं। सबसे पहले, उन सभी सहकर्मियों को धन्यवाद, जिन्होंने अपनी अन्य व्यस्तताओं से समय निकालकर इस कार्य को पूरा करने में अपना सहयोग दिया। पाठ्यपुस्तक की पाठ्यसामग्री में उल्लेखनीय योगदान के लिए संपादक दल के सदस्यों अमिता बाविसकर, कुशल देब, अंजन घोष एवं कैरल उपाध्याय को हम धन्यवाद देते हैं। हम प्रोफ्रेसर नंदिनी सुंदर, समाजशास्त्र विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय; नित्या रामाकृष्णन, बकील, नयी दिल्ली; लता गोविंद, लखनऊ; सीमा बनर्जी, लक्ष्मण पब्लिक स्कूल, नयी दिल्ली एवं देव पाठक, झ्लूबेल इंटरनेशनल स्कूल, नयी दिल्ली का भी उनके सहयोग एवं सुझावों के लिए आभार व्यक्त करते हैं। हम प्रोफ्रेसर सतीश सबरवाल एवं प्रोफ्रेसर एन. जयराम के विशेष आभारी हैं जिन्होंने मॉनीटरिंग कमेटी के सदस्य के रूप में इस पाठ्यपुस्तक को बेहतर बनाने में विशेष योगदान दिया।

श्वेता राव विशेष धन्यवाद की पात्र हैं जिन्होंने बहुत कम समय में विभिन्न स्रोतों से कुछ छायाचित्र इकट्टे किए और इस पाठ्यपुस्तक को डिजाइन करने की चुनौती को स्वीकारा। इनका योगदान पाठ्यपुस्तक के हर पृष्ठ पर दिखाई देता है।

हमेशा की तरह मुख्य सलाहकार, प्रोफेसर योगेंद्र सिंह समर्थन के स्तंभ रहे और उन्होंने हममें आगे बढ़ने के लिए आवश्यक विश्वास जागृत किया। प्रोफेसर कृष्ण कुमार, निदेशक, एन.सी.ई.आर.टी. के साथ मिलकर प्रोफेसर योगेंद्र सिंह ने बो अभय हस्त प्रदान किया जिससे हमारे सामूहिक प्रयासों को दिशा मिली। प्रोफेसर सविता सिन्हा, अध्यक्ष, सामाजिक विज्ञान एवं मानविकी शिक्षा विभाग, एन.सी.ई.आर.टी., नयी दिल्ली ने हर क्षण, हर तरह का समर्थन प्रदान किया। श्वेता उप्पल, मुख्य संपादक, प्रकाशन विभाग, एन.सी.ई.आर.टी. ने हमारे काम को सरल तो बनाया ही साथ ही उन्होंने हममें ऐसे ऊँचे लक्ष्य निर्धारित करने के लिए प्रोत्साहित किया जो शायद हम स्वयं तय न कर पातो।

वंदना आर. सिंह संपूर्ण पाठ्यपुस्तक को पढ़ने एवं परिवर्तन के लिए आवश्यक सुझाव देने के लिए विशेष धन्यवाद की पात्र है। इस पुस्तक के निर्माण में योगदान के लिए परिषद् नाजिया खान, नरगिस इस्लाम, डी. टी. पी. ऑपरेटर; मनोज मोहन, कॉपी एडीटर; अचल कुमार, अनामिका गोविल, प्रूफ रीडर एवं दिनेश कुमार, कंप्यूटर स्टेशन इंचार्ज का भी आभार व्यक्त करती हौ। हम प्रकाशन विभाग का भी उनके सहयोग के लिए आभार प्रकट करते हैं।

अंततः हम उन सभी संस्थाओं एवं व्यक्तियों के प्रति आभारी हैं जिन्होंने हमें उनके प्रकाशनों से सामग्री उपयोग करने की अनुमति दी। डा. सी. पी. चंद्रशेखर, डा. रामचंद्र गुहा को हम धन्यवाद देते हैं जिनके लेखों का फ्रंटलाइन, द टाइम्स ऑफर इंडिया से हमने उपयोग किया है। एन.सी.ई.आर.टी. आर. के. लक्ष्मण की विशेष आभारी है जिन्होंने अपने कार्टूनों का इस पाठ्यपुस्तक में उपयोग करने की अनुमति दी। परिषद् डा. मालविका कारलेकर का भी आभार व्यक्त करती है जिन्होंने ऑक्सफ्रोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, नयी दिल्ली द्वारा प्रकाशित अपनी पुस्तक विजुअलाइजिंग इंडियन वीमन 1857–1947, से छायाचित्रों के प्रयोग के लिए हमें अनुमति दी। हम सेंटर फॉर स्ट्डीज इन सोशल साइंसेस, कोलकाता के भी आभारी हैं जिन्होंने स्वर्गीय सिब्धार्थ घोष के संकलन से छायाचित्र का उपयोग करने की हमें अनुमति दी। कुछ छायाचित्र राजस्थान पर्यटन विभाग, भारत सरकार, नयी दिल्ली, इंडिया टुडे, आउटलुक एवं फ्रंटलाइन से लिए गए है। परिषद् इन लेखकों, कॉपीराइट धारकों तथा प्रकाशकों के प्रति आभार व्यक्त करती है। परिषद् प्रेस सूचना ब्यूरो, सूचना तथा प्रसारण मंत्रालय, नयी दिल्ली को भी उनके फ्रोटो पुस्तकालय में उपलब्ध चित्रों के उपयोग की अनुमति देने के लिए धन्यवाद देती है। एक कोलाज का निर्माण सेंट मैरी स्कूल, नयी दिल्ली की कक्षा 6 की छात्रा महिमा चोपड़ा द्वारा किया गया था। परिषद् इस छात्रा के प्रति आभार व्यक्त करती है। कुछ छायाचित्र समरक्षण ट्रस्ट, नयी दिल्ली; आरती नागराज, नयी दिल्ली, वाय. के. गुप्ता एवं आर. सी. दास, केंद्रीय शैक्षिक प्रौद्योगिकी संस्थान, एन.सी.ई.आर.टी. द्वारा प्रदान किए गए थे। परिषद् इन सभी के प्रति आभार व्यक्त करती है।

परिषद्, इस संस्करण के पुनर्स्योजन के लिए पाठ्यक्रमों, पाठ्यपुस्तकों एवं विषय सामग्री के विश्लेषण हेतु दिए गए महत्वपूर्ण सहयोग के लिए मंजू भट्ट, सेवानिवृत प्रोफेसर, एन.सी.ई.आर.टी.,, अचला प्रितम टंडन, एसोसिएट प्रोफेसर, समाजशास्त्र, हिंदू कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, सीमा बेनर्जी, पी.जी.टी. समाजशास्त्र, लक्ष्मण पब्लिक स्कूल, हौज खास इंक्लेव, नयी दिल्ली, आभा सेठ, सेवानिवृत्त पी.जी.टी. समाजशास्त्र, नयी दिल्ली, के प्रति आभार व्यक्त करती हौ।

विषय-सूची

•
आमुख iii
•
इस पाठ्यपुस्तक का उपयोग vii
•
अध्याय 1 1-6
•
भारतीय समाज : एक परिचय (मूल्यांकन के लिए नहीं है)
•
अध्याय 2 7–38
•
भारतीय समाज की जनसांख्यिकीय संरचना
•
अध्याय 3 39–56
•
सामाजिक संस्थाएँ : निरंतरता एवं परिवर्तन
•
अध्याय 4 57-72
•
बाज्ञार एक सामाजिक संस्था के रूप में
•
अध्याय 5 73-102
•
सामाजिक विषमता एवं बहिष्कार के स्वरूप
•
अध्याय 6 103–124
•
सांस्कृतिक विविधता की चुनौतियाँ
•
अध्याय 7 125–136
•
परियोजना कार्य के लिए सुझाव (मूल्यांकन के लिए नहीं है)
•
शब्दावली 137-144

भारत का संविधान

भाग 4क

नागरिकों के मूल कर्तव्य

अनुच्छेद 51 क

मूल कर्तव्य - भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वह -

(क) संविधान का पालन करे और उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का आदर करे;

(ख) स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आद्शों को हद्य में संजोए रखे और उनका पालन करे;

(ग) भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करे और उसे अक्षुण्ण बनाए रखे;

(घ) देश की रक्षा करे और आहवान किए जाने पर राष्ट्र की सेवा करे;

(ड) भारत के सभी लोगों में समरसता और समान भ्रातृत्व की भावना का निर्माण करे जो धर्म, भाषा और प्रदेश या वर्ग पर आधारित सभी भेदभावों से परे हो, ऐसी प्रथाओं का त्याग करे जो महिलाओं के सम्मान के विरुद्ध हों;

(च) हमारी सामासिक संस्कृति की गौरवशाली परंपरा का महत्व समझे और उसका परिरक्षण करे;

(छ) प्राकृतिक पर्यावरण की, जिसके अंतर्गत बन, झील, नदी और वन्य जीव हैं, रक्षा करे और उसका संवर्धन करे तथा प्राणिमात्र के प्रति दयाभाव रखे;

(ज) वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करे;

(झ) सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखे और हिंसा से दूर रहे;

(ज) व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष की और बढ़ने का सतत् प्रयास करे, जिससे राष्ट्र निरंतर बढ़ते हुए प्रयत्न और उपलब्धि की नई ऊँचाइयों को छू सके; और

(ट) यदि माता-पिता या संरक्षक है, छह वर्ष से चौदह वर्ष तक की आयु वाले अपने, यथास्थिति, बालक या प्रतिपाल्य को शिक्षा के अवसर प्रदान करे।

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