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Unit5

भारत का संविधान उहेशिका

समाज का बोध

कक्षा 11 के लिए पाठ्यपुस्तक

11107
11107
एनसीई आरटी
NCERT
एनसीई आरटी NCERT

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद्

NATIONAL COUNCIL OF EDUCATIONAL RESEARCH AND TRAINING

प्रथम संस्करण

सितंबर 2006 आश्विन 1928

पुनर्मुद्रण

जनवरी 2007, नवंबर 2007,

दिसंबर 2008, जनवरी 2010,

नवंबर 2010, जनवरी 2011,

अप्रैल 2013, अक्तूबर 2014,

फरवरी 2015, दिसंबर 2015,

दिसंबर 2016, दिसंबर 2017,

जनवरी 2019, अक्तूबर 2019,

मार्च 2021, दिसंबर 2021

संशोधित संस्करण

मार्च 2023, चैत्र 1944

पुनमुद्रण

मार्च 2024 चैत्र 1946

जनवरी 2025 पौष 1946

PD 8T M

© राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् 2006, 2023

₹ 55.00

एन.सी.ई.आर.टी. वाटरमार्क 80 जी.एस.एम. पेपर पर मुद्रित।

प्रकाशन प्रभाग में सचिव, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद्, श्री अरविंद मार्ग, नयी दिल्ली 110 016 द्वारा प्रकाशित तथा वीके ग्लोबल डिजिटल, प्लॉट नंबर-928, सेक्टर-68, आई. एम. टी. फरीदाबाद, हरियाणा-121004 द्वारा मुद्रित।

सर्वाधिकार सुरक्षित

•
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•
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प्रकाशन सहयोग

अध्यक्ष, प्रकाशन प्रभाग : एम.वी. श्रीनिवासन

मुख्य संपादक : बिज्ञान सुतार

मुख्य उत्पादन अधिकारी : जहान लाल (प्रभारी)

मुख्य व्यापार प्रबंधक : अमिताभ कुमार

संपादक : नरेश यादव

सहायक उत्पादन अधिकारी : सायुराज ए.आर.

आवरण

अमित श्रीवास्तव

आमुख

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (2005) सुझाती है कि बच्चों के स्कूली जीवन को बाहर के जीवन से जोड़ा जाना चाहिए। यह सिद्धांत किताबी ज्ञान की उस विरासत के विपरीत है जिसके प्रभाववश हमारी व्यवस्था आज तक स्कूल और घर के बीच अंतराल बनाए हुए है। नयी राष्ट्रीय पाठ्यचर्या पर आधारित पाठ्यक्रम और पाठ्यपुस्तकें इस बुनियादी विचार पर अमल करने का प्रयास हैं। इस प्रयास में हर विषय को एक मजबूत दीवार से घेर देने और जानकारी को रटा देने की प्रवृत्ति का विरोध शामिल है। आशा है कि ये कदम हमें राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1986) में वर्णित बाल-केंद्रित व्यवस्था की दिशा में काफ्री दूर तक ले जाएँगे।

इस प्रयत्न की सफलता अब इस बात पर निर्भर है कि स्कूलों के प्राचार्य और अध्यापक बच्चों को कल्पनाशील गतिविधियों और सवालों की मद्द से सीखने और सीखने के दौरान अपने अनुभवों पर विचार करने का कितना अवसर देते हैं। हमें यह मानना होगा कि यदि जगह, समय और आज्ञादी दी जाए तो बच्चे बड़ों ढ्वारा सौपी गई सूचना-सामग्री से जुड़कर और जूझकर नए ज्ञान का सूजन करते हैं। शिक्षा के विविध साधनों एवं स्रोतों की अनदेखी किए जाने का प्रमुख कारण पाठ्यपुस्तक को परीक्षा का एकमात्र आधार बनाने की प्रवृत्ति है। सर्जना और पहल को विकसित करने के लिए ज़रूरी है कि हम बच्चों को सीखने की प्रक्रिया में पूरा भागीदार मानें और बनाएँ, उन्हें ज्ञान की निर्धीरित खुराक का ग्राहक मानना छोड़ दें।

ये उद्देश्य स्कूल की दैनिक जिंदगी और कार्यशैली में काफ्री फेरबद्ल की माँग करते हैं। दैनिक समय-सारणी में लचीलापन उतना ही ज़रुरी है जितना कि वार्षिक कैलॉंडर के अमल में चुस्ती, जिससे शिक्षण के लिए नियत दिनों की संख्या हकीकत बन सके। शिक्षण और मूल्यांकन की विधियाँ भी इस बात को तय करेंगी कि यह पाठ्यपुस्तक स्कूल में बच्चों के जीवन को मानसिक दबाव तथा बोरियत की जगह खुशी का अनुभव बनाने में कितनी प्रभावी सिछ्ट होती हैं। बोझ की समस्या से निपटने के लिए पाठ्यक्रम निर्माताओं ने विभिन्न चरणों में ज्ञान का पुनर्निर्धारण करते समय बच्चों के मनोविज्ञान एवं अध्यापन के लिए उपलब्ध समय का ध्यान रखने की पहले से अधिक सचेत कोशिश की है। इस कोशिश को और गहराने के यत्न में यह पाठ्यपुस्तक सोच-विचार और विस्मय, छोटे समूहों में बातचीत एवं बहस और हाथ से की जाने वाली गतिविधियों को प्राथमिकता देती है।

एन.सी.ई.आर.टी. इस पुस्तक की रचना के लिए बनाई गई पाठ्यपुस्तक निर्माण समिति के परिश्रम के लिए कृतज्ञता व्यक्त करती है। परिषद् सामाजिक विज्ञान पाठ्यपुस्तक सलाहकार समूह के अध्यक्ष प्रोफेसर हरि वासुदेवन और समाजशास्त्र पाठ्यपुस्तक समिति के मुख्य सलाहकार प्रोफेसर योगेंद्र सिंह की विशेष आभारी है। इस पाठ्यपुस्तक के विकास में कई शिक्षकों ने योगदान दिया, इस योगदान को संभव बनाने के लिए हम उनके प्राचायों के आभारी हैं। हम उन सभी संस्थाओं और संगठनों के प्रति कृतज्ञ हैं जिन्होंने अपने संसाधनों, सामग्री तथा सहयोगियों की मदद लेने में हमें उदारतापूर्वक सहयोग दिया। हम माध्यमिक एवं उच्च शिक्षा विभाग, मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा प्रोफेसर मृणाल मीरी एवं प्रोफेसर जी.पी. देशपांडे की अध्यक्षता में गठित निगरानी समिति (मॉनीटरिंग कमेटी) के सदस्यों को अपना मूल्यवान समय और सहयोग देने के लिए धन्यवाद देते हैं। व्यवस्थागत सुधारों और अपने प्रकाशनों में निरंतर निखार लाने के प्रति समर्पित एन.सी.ई.आर.टी. टिप्पणियों व सुझावों का स्वागत करेगी, जिनसे भावी संशोधनों में मदद ली जा सके।

निदेशक

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान

और प्रशिक्षण परिषद्

नयी दिल्ली

20 दिसंबर 2005

पाठ्यपुस्तकों में पाठ्य सामग्री का पुनर्स्थोजन

कोविड-19 महामारी को देखते हुए, विद्यार्थियों के ऊपर से पाठ्य सामग्री का बोझ कम करना अनिवार्य है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 में भी विद्यार्थियों के लिए पाठ्य सामग्री का बोझ कम करने और रचनात्मक नज्ञरिए से अनुभवात्मक अधिगम के अवसर प्रदान करने पर जोर दिया गया है। इस पृष्ठभूमि में, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् ने सभी कक्षाओं में पाठ्यपुस्तकों को पुनर्स्योजित करने की शुरुआत की है। इस प्रक्रिया में रा.शै.अ.प्र.प. द्वारा पहले से ही विकसित कक्षावार सीखने के प्रतिफलों को ध्यान में रखा गया है।

पाठ्य सामग्रियों के पुनर्स्योजन में निम्नलिखित बिंदुओं को ध्यान में रखा गया है --

•
एक ही कक्षा में अलग-अलग विषयों के अंतर्गत समान पाठ्य सामग्री का होना;
•
एक कक्षा के किसी विषय में उससे निचली कक्षा या ऊपर की कक्षा में समान पाठ्य सामग्री का होना;
•
कठिनाई स्तर;
•
विद्यार्थियों के लिए सहज रूप से सुलभ पाठ्य सामग्री का होना, जिसे शिक्षकों के अधिक हस्तक्षेप के बिना, वे खुद से या सहपाठियों के साथ पारस्परिक रूप से सीख सकते हों;
•
वर्तमान संदर्भ में अप्रासंगिक सामग्री का होना।

वर्तमान संस्करण, ऊपर दिए गए परिवर्तनों को शामिल करते हुए तैयार किया गया पुनर्स्योजित संस्करण है।

शिक्षकों एवं विद्यार्थियों के लिए दो शब्द

हमारी प्रारंभिक पाठ्यपुस्तक में हमारा उद्देश्य विद्यार्थियों को समाजशास्त्र का परिचिय कराना था। अतः हमने समाज के उद्धभव एवं विषय के मुख्य सरोकारों के अध्ययन के लिए इसके उपकरणों एवं पढ़तियों के बारे में चर्चा की। समाज को समझने के अपने प्रयास के तहत समाजशास्त्र का एक मुख्य सरोकार व्यक्ति और समाज के बीच के संबंध को समझना था। व्यक्ति समाज में कोई कार्य करने के लिए किस सीमा तक स्वतंत्र है और किस सीमा तक बाध्य?

इस पुस्तक में हम सामाजिक संरचना, सामाजिक स्तरीकरण एवं सामाजिक प्रक्रियाओं की अवधारणाओं को जानकर इस संबंध को बेहतर तरीके से समझने का प्रयास करेंगे। हम यह समझने का प्रयास करेंगे कि व्यक्ति समूहों की सामाजिक संरचना में कहाँ स्थान पाते हैं और वे किस तरह कार्य करते और सामाजिक प्रक्रियाओं को प्रारंभ करते हैं। वे किस प्रकार सहयोग, प्रतियोगिता और संघर्ष करते हैं? वे भिन्न प्रकार के समाज में सहयोग, प्रतियोगिता और संघर्ष को भिन्न प्रकार से क्यों करते हैं? समाजशास्त्र के मूल प्रश्नों के उपागम को आगे बढ़ाते हुए पहली पाठ्यपुस्तक में हमने इन प्रक्रियाओं को उनके स्वाभाविक और अपरिवर्तनीय रूप में नहीं देखा पर उन्हें सामाजिक रूप में बनते हुए देखा। हम प्रकृतिवादियों की इस व्याख्या को स्वीकार नहीं करते कि मानव स्वभाव से ही प्रतियोगी और संघर्ष प्रवृत्ति का होता है।

सामाजिक संरचना और सामाजिक प्रक्रियाओं की अवधारणा इस तथ्य की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करती है कि समाज व्यवस्था और परिवर्तन दोनों से ही संचालित होता है। कुछ चीजें सदा समान रहती हैं। ग्रामीण एवं नगरीय समाजों में पाए जाने वाली व्यवस्था और परिवर्तन हमें निरंतरता और परिवर्तन को ठीक से समझने में सहायता देते हैं।

आगे हम समाज और पर्यवरण के मध्य इन आधारभूत संबंधों को देखेंगे और समकालीन विकासों को देखते हुए पर्यवरण की समाजशास्त्रीय समझ को आरेखित करेंगे।

प्रथम पाठ्यपुस्तक में हमने समाजशास्त्र के उद्धव और इसके द्वारा आधुनिकता को समझने के लिए किए जा रहे प्रयास को जाना। प्रस्तुत पाठ्यपुस्तक में हम कतिपय मुख्य अवधारणाओं का परिचिय देंगे, जिन्हें पाश्चात्य एवं भारतीय विचारकों ने आधुनिक समाजों की संरचना एवं प्रकायों को समझने के लिए विकसित किया है।

हमारा विचार यहाँँ उनके सर्वागीण विचारों को बताने का नहीं है, बैसे भी उसे हमारे समय और स्थान की सीमा में रख पाना संभव नहीं है। यहाँँ हमारा केंद्रबिंदु उनके विचारों एवं कार्यों के कुछ पक्षों को बताना ही है। हम आशा करते हैं कि इससे हम इन विचारकों के कार्यों के महत्व से आपको परिचित करा पाएँगे। उदाहरण के लिए हम कार्ल माक्स्प द्वारा दिए गए वर्ग संघर्ष के सिद्धांत को जानेंगे। एमिल दुरुखाइम के श्रम विभाजन के विचारों को और मैक्स वेबर के नौकरशाही के विचारों को जानेंगे। इसी तरह हम भारतीय विचारक जी.एस. घूर्ये के प्रजाति एवं जाति संबंधी विचारों को, डी.पी. मुखर्जी के परंपरा और परिवर्तन के विचारों को और ए.आर. देसाई के राज्य संबंधी विचारों को और एम.एन. श्रीनिवास के ग्रामीण भारत संबंधी विचारों से परिचित होंगे।

समाजशास्त्र की प्रश्नात्मक प्रवृत्ति को ध्यान में रखते हुए, यह पाठ्यपुस्तक भी पिछली पाठ्यपुस्तक की तरह पाठकों की लगातार सोचने, प्रतिबिंबित करने तथा समाज में और एक व्यक्ति के रूप में हमारे साथ क्या हो रहा है, से हमें संबढ़ करती है। इस पाठ्यपुस्तक में दिए गए क्रियाकलाप पाठ्यपुस्तक का एक आंतरिक हिस्सा है। पाठ्यसामग्री तथा क्रियाकलाप एक एकीकृत समग्र बनाते हैं। एक के बगैर दूसरा कार्य नहीं कर सकता। समाज के बारे में बनी बनाई जानकारी देने के बजाय यहाँ समाज को समझने में मदद करना ही इसका उद्देश्य है। तिथियाँ जो विचारकों के जीवन तथा कार्यों को दर्शाती हैं, उन्हें केवल विचारकों के ऐतिहासिक संदभों के एक वृहद बोध को दर्शाने के लिए शामिल की गई हैं। पाठ्यपुस्तक क्रियात्मक होने का प्रयास करती है तथा साथ ही विभिन्न क्रियाकलापों से परिचित कराती है, जिससे कि छात्रों को समाज को एक जीवन की तरह समझने में मदद मिल सके। यद्यपि, सर्वाधिक रोमांचक तथा नवप्रवर्तनीय हिस्सा कक्षा में शिक्षकों तथा विद्यार्थियों के साथ ही संभव होता है। वे संभवतः और अधिक उदाहरण तथा क्रियाकलापों को जोड़ने में सक्षम होंगे। यहाँ यह विचार भी अंतःक्रियात्मक वाद-विवाद की शुरुआत करना है। यह केवल एक शुरुआत है। इसके साथ ही और बहुत सारी सीखने की प्रक्रियाएँ कक्षा में होंगी। विद्यार्थी एवं शिक्षक संभवतः और बेहतर तरीकों से क्रियाकलापों एवं उदाहरणों के बारे में सोच सकते हैं तथा पाठ्यपुस्तक को और बेहतर बनाने के बारे में सुझाव दे सकते हैं।

प्रो. मैत्रेयी चौधरी

प्रो. मंजु भट

पाठ्यपुस्तक निर्माण समिति

अध्यक्ष, सामाजिक विज्ञान पाठ्यपुस्तक सलाहकार समिति

हरि वासुदेवन, प्रोफेसर, इतिहास विभाग, कलकता, विश्वविद्यालय, कोलकाता।

मुख्य सलाहकार

योगेंद्र सिंह, प्रोफ्रेसर (एमरिटस), सेंटर फॉर द सोशल सिस्टम, जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, नयी दिल्ली।

सदस्य

अंजन घोष, फैलो, सेंटर फॉर स्टडीज़ इन सोशल साइंसेज़, कोलकाता।

अमिता बाविस्कर, प्रोफेसर, इस्टीट्यूट ऑफ़ इकॉनोमिक ग्रोथ, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली।

आभा अवस्थी, प्रोफेसर (सेवानिवृत्त), समाजशास्त्र विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ।

जितेंद्र प्रसाद, प्रोफ्रेसर (सेवानिबृत्त), समाजशास्त्र विभाग, महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक।

डी.के. शर्मा, प्रोफ्रेसर (सेवानिवृत्त), सामाजिक विज्ञान शिक्षा विभाग, रा.शै.अ.प्र.प., नयी दिल्ली।

दिशा नवानी, प्रवक्ता, समाजशास्त्र विभाग, गार्गी महाविद्यालय, नयी दिल्ली।

बलाका डे, कार्यक्रम सहायक, यूनाइटेड नेशंस, डेवेलपमेंट प्रोग्राम, नयी दिल्ली।

मधु नागला, प्रोफेसर, समाजशास्त्र विभाग, महर्षि द्यानंद विश्वविद्यालय, रोहतक।

मधु शरन, प्रोजेक्ट निर्देशक, हैन्ड-इन-हैन्ड, चेन्नई।

मैत्रेयी चौधरी, प्रोफ्रेसर, संटर फॉर द स्टडीज्ञ ऑफ सोशल सिस्टम, जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, नयी दिल्ली।

राजीव गुप्ता, प्रोफ्रेसर (सेवानिवृत्त), समाजशास्त्र विभाग, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर।

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विश्वरक्षा, एसोसिएट प्रोफेसर, समाजशास्त्र विभाग, जम्मू विश्वविद्यालय, जम्मू।

सारिका चन्द्रवंशी साजू, असिस्टेन्ट प्रोफ्रेसर, आर. आई. ई., भोपाल, रा.शै.अ.प्र.प., नयी दिल्ली।

सतीश देशपांडे, प्रोफेसर, समाजशास्त्र विभाग, दिल्ली स्कूल ऑफ्र इकोनोमिक्स, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली।

हिंदी अनुवाद

कंचन वर्मा, पी.जी.टी., जी.डी. गोयनका विद्यालय, नयी दिल्ली।

सदस्य समन्वयक

मंजु भट्, प्रोकेसर एवं अध्यक्ष सामाजिक विज्ञान शिक्षा विभाग, रा.शै.अ.प्र.प., नयी दिल्ली।

आभार

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् इस पाठ्यपुस्तक के निर्माण में सहयोग देने हेतु करूणा चानना, प्रोफेसर (अवकाश प्राप्त), जाकिर हुसैन सेंटर फॉर एजुकेशनल स्टडीज़, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नयी दिल्ली; अरविंद चौहान, प्रोफेसर, समाजशास्त्र विभाग, बरकतुल्लाह विश्वविद्यालय, भोपाल; देबल सिंह राय, प्रोफेसर, समाजशास्त्र विभाग, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय, नयी दिल्ली; राजेश मिश्रा, प्रोफेसर, समाजशास्त्र विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ; एस.एम. पटनायक, प्रवाचक, मानवविज्ञान विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली; सुदर्शन गुप्ता, प्रिसिपल, राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, पलोरा, जम्मू; मनदीप चौधरी, पी.जी.टी. (सेवानिवृत्त) (समाजशास्त्र), गुरु हरकिशन पब्लिक स्कूल, नयी दिल्ली; सीमा बनर्जी, पी.जी.टी. (समाजशास्त्र), लक्ष्मन पब्लिक स्कूल, नयी दिल्ली; रीता खन्ना, पी.जी.टी. (समाजशास्त्र), दिल्ली पब्लिक स्कूल, नयी दिल्ली; सुधा कालरा, पी.जी.टी. (सेवानिवृत्त) (समाजशास्त्र), राजकीय उच्च माध्यमिक कन्या विद्यालय, लक्ष्मीनगर, दिल्ली; ए. आमिर अंसारी, पी.जी.टी. (समाजशास्त्र), स्वतंत्र भारत मिल उच्च माध्यमिक विद्यालय, नयी दिल्ली एवं कंचन वर्मा, पी.जी.टी. (हिंदी), जी.डी. गोयनका विद्यालय, नयी दिल्ली का आभार व्यक्त करती है। उपर्युक्त में से कुछ सदस्यों ने पुस्तक के पुनरावलोकन में भी अपना सहयोग दिया हम उनके भी आभारी हैं।

परिषद् सविता सिन्हा, प्रोफ्रेसर एवं अध्यक्ष (सेवानिवृत्त), सामाजिक विज्ञान शिक्षा विभाग का भी उनके सहयोग के लिए आभार व्यक्त करती है।

परिषद् सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, नयी दिल्ली; वी. सुरेश, पी.जी.टी. (जूलोजी), श्रीविद्या मैट्ट्रकुलेशन हायर सेकंडरी स्कूल, उतंगरी, तमिलनाडु; एल. चक्रवर्ती, छायाचित्रकार, उतंगरी, तमिलनाडु का उनके चित्रों को इस पाठ्यपुस्तक में प्रयोग करने के लिए उनका आभार व्यक्त करती है। इस पाठ्यपुस्तक में दिए गए चित्रों में से कुछ चित्र हमें आर.सी. दास, छायाचित्रकार, सी.आई.ई.टी., एन.सी.ई.आर.टी., नयी दिल्ली द्वारा प्राप्त हुए इसके लिए परिषद् उनकी आभारी है। कुछ चित्र हमने विभिन्न पत्रिकाओं से प्राप्त किए, वे हैं-बिज्ञनिस वर्ल्ड,

xii

बिज्ञनिस टुडे और बिज्ञनिस एंड इकोनोमी, इसके लिए परिषद् कापीराइट धारकों तथा प्रकाशकों के प्रति अपना आभार एवं धन्यवाद व्यक्त करती है।

परिषद्, इस पुस्तक के पुनर्स्योजन के लिए पाठ्यक्रमों, पाठ्यपुस्तकों एवं विषय सामग्री के विश्लेषण हेतु दिए गए महत्वपूर्ण सहयोग के लिए मंजू भट्, प्रोफेसर (सेवानिवृत्त), एन.सी.ई.आर.टी.; अचला प्रितम टंडन, एसोसिएट प्रोफेसर, समाजशास्त्र, हिंदू कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय; सीमा बेनर्जी, पी.जी.टी. समाजशास्त्र, लक्ष्मण पब्लिक स्कूल, हौज्ञ खास एन्कलेव, नयी दिल्ली; आभा सेठ, पी.जी.टी. (सेवानिवृत्त), समाजशास्त्र, नयी दिल्ली के प्रति आभार व्यक्त करती है।

इस पुस्तक के चरणबढ़ विकास के लिए परिषद् डी.टी.पी. ऑफरेटर गिरीश गोयल एवं अनिल शर्मा; कॉपी एडीटर सुप्रिया गुप्ता एवं यतेन्द्र कुमार यादव तथा पूफ रीडर अनिल शर्मा की आभारी है। परिषद् कंप्यूटर स्टेशन प्रभारी दिनेश कुमार के प्रति भी आभार व्यक्त करती है। हम प्रकाशन विभाग, एन.सी.ई.आर.टी. का भी उनके सहयोग के लिए आभार व्यक्त करते हैं।

प्रो. मैत्रेयी चौधरी

प्रो. मंजु भट्ट

विषय-सूची

आमुख iii

पाठ्यपुस्तकों में पाठ्य सामग्री का पुनर्सयोजन v

शिक्षकों एवं विद्यार्थियों के लिए दो शब्द vii

•
समाज में सामाजिक संरचना, स्तरीकरण और सामाजिक प्रक्रियाएँ 1
•
ग्रामीण तथा नगरीय समाज में सामाजिक परिवर्तन तथा सामाजिक व्यवस्था 22
•
पर्यावरण और समाज 51
•
पाश्चात्य समाजशास्त्री-एक परिचय 68
•
भारतीय समाजशास्त्री 87

हम, भारत के लोग, भारत को एक ¹[संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य] बनाने के लिए, तथा उसके समस्त नागरिकों को :

सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय,

विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म

और उपासना की स्वतंत्रता,

प्रतिष्ठा और अवसर की समता

प्राप्त कराने के लिए,

तथा उन सब में

व्यक्ति की गरिमा और ²[राष्ट्र की एकता

और अखंडता] सुनिश्चित करने वाली बंधुता

बढ़ाने के लिए

दृद्धसंकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवंबर, 1949 ई. को एतद्धारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।

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