भारत का संविधान
समाजशास्त्र परिचिय
कक्षा 11 की पाठ्यपुस्तक

![विद्या 5 मृतमजनुते[Unreadable]NCERT](https://api.eduteria.com/api/books/assets/NcertClass11/Sociology/khsy1dd/khsy1ps/mineru/khsy1ps/hybrid_auto/images/7b7cd61400ef65efada34dbea876057a80fe9708298a3d049800639445f4e24d.jpg)
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद्
NATIONAL COUNCIL OF EDUCATIONAL RESEARCH AND TRAINING
प्रथम संस्करण
जून 2006 आषाढ़ 1928
पुनर्मुद्रण
नवंबर 2006 मार्गशीर्ष 1928
अक्तूबर 2007 आश्विन 1929
जनवरी 2009 पौष 1930
जनवरी 2010 माध 1931
जनवरी 2012 माध 1933
अप्रैल 2013 चैत्र 1935
अक्तूबर 2014 कार्तिक 1936
फ़रवरी 2015 फाल्गुन 1936
दिसंबर 2015 अग्रहायण 1937
दिसंबर 2016 पौष 1938
जनवरी 2018 माघ 1939
जनवरी 2019 पौष 1940
अक्तूबर 2019 अश्विन 1941
फ़रवरी 2021 माघ 1942
नवंबर 2021 अग्रहायण 1943
जून 2023 जेष्ठ 1945
मार्च 2024 चैत्र 1946
जनवरी 2025 पौष 1946
PD 15T M
© राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद्, 2006
₹65.00
एन.सी.ई.आर.टी. वाटरमार्क 80 जी.एस.एम. पेपर पर मुद्रित।
प्रकाशन प्रभाग में सचिव, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधन ऑर प्रशिक्षण परिषद्, श्री अरविंद मार्ग, नयी दिल्ली 110 016 ढारा प्रकाशित तथा बीके ग्लोबल डिजिटल, प्लॉट नंबर-928, सेक्टर-68, आई.एम.टी. फरीदाबाद, हरियाणा-121004 ढारा मुद्रित।
सर्वाधिकार सुरक्षित
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नवजीवन ट्रस्ट भवन
डाकघर नवजीवन
अहमदाबाद 380 014 फोन : 079-27541446
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कोलकाता 700 114 फोन : 033-25530454
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गुवाहाटी 781021 फोन : 0361-2674869
प्रकाशन सहयोग
अध्यक्ष, प्रकाशन प्रभाग : एम.वी. श्रीनिवासन
मुख्य संपादक : बिज्ञान सुतार
मुख्य उत्पादन अधिकारी : जहान लाल (प्रभारी)
मुख्य व्यापार प्रबंधक : अमिताभ कुमार
संपाद्क : मीरा कांत
सहायक उत्पादन अधिकारी : सायुराज ए.आर.
आवरण
श्वेता राव
आमुख
राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (2005) सुझाती है कि बच्चों के स्कूली जीवन को बाहर के जीवन से जोड़ा जाना चाहिए। यह सिद्धांत किताबी ज्ञान की उस विरासत के विपरीत है जिसके प्रभाववश हमारी व्यवस्था आज तक स्कूल और घर के बीच अंतराल बनाए हुए है। नयी राष्ट्रीय पाठ्यचर्या पर आधारित पाठ्यक्रम और पाठ्यपुस्तकें इस बुनियादी विचार पर अमल करने का प्रयास है। इस प्रयास में हर विषय को एक मज्जबूत दीवार से घेर देने और जानकारी को रटा देने की प्रवृत्ति का विरोध शामिल है। आशा है कि ये कदम हमें राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1986) में वर्णित बाल-केंद्रित व्यवस्था की दिशा में काफ्री दूर तक ले जाएँगे।
इस प्रयत्न की सफलता अब इस बात पर निर्भर है कि स्कूलों के प्राचार्य और अध्यापक बच्चों को कल्पनाशील गतिविधियों और सवालों की मद्द से सीखने और सीखने के दौरान अपने अनुभवों पर विचार करने का कितना अवसर देते हैं। हमें यह मानना होगा कि यदि जगह, समय और आज्ञादी दी जाए तो बच्चे बड़ों द्वारा सौपी गई सूचना-सामग्री से जुड़कर और जूझकर नए ज्ञान का सृजन करते हैं। शिक्षा के विविध साधनों एवं स्रोतों की अनदेखी किए जाने का प्रमुख कारण पाठ्यपुस्तक को परीक्षा का एकमात्र आधार बनाने की प्रवृत्ति है। सर्जना और पहल को विकसित करने के लिए जरूरी है कि हम बच्चों को सीखने की प्रक्रिया में पूरा भागीदार मानें और बनाएँ, उन्हें ज्ञान की निर्धीरित खुराक का ग्राहक मानना छोड़ दें।
ये उद्देश्य स्कूल की दैनिक जिंदगी और कार्यशैली में काफ्री फेरबदल की माँग करते हैं। दैनिक समय-सारणी में लचीलापन उतना ही जरुरी है जितना वार्षिक कैलेंडर के अमल में चुस्ती, जिससे शिक्षण के लिए नियत दिनों की संख्या हकीकत बन सके। शिक्षण और मूल्यांकन की विधियाँ भी इस बात को तय करेंगी कि यह पाठ्यपुस्तक स्कूल में बच्चों के जीवन को मानसिक दबाव तथा बोरियत की जगह खुशी का अनुभव कराने में कितनी प्रभावी सिछ्ट होती हैं। बोझ की समस्या से निपटने के लिए पाठ्यक्रम निर्माताओं ने विभिन्न चरणों में ज्ञान का पुनर्निर्धारण करते समय बच्चों के मनोविज्ञान एवं अध्यापन के लिए उपलब्ध समय का ध्यान रखने की पहले से अधिक सचेत कोशिश की है। इस कोशिश को और गहराने के यत्न में यह पाठ्यपुस्तक सोच-विचार और विस्मय, छोटे समूहों में बातचीत एवं बहस और हाथ से की जाने वाली गतिविधियों को प्राथमिकता देती है।
एन.सी.ई.आर.टी. इस पुस्तक की रचना के लिए बनाई गई पाठ्यपुस्तक निर्माण समिति के परिश्रम के लिए कृतज्ञता व्यक्त करती है। परिषद् सामाजिक विज्ञान पाठ्यपुस्तक सलाहकार समूह के अध्यक्ष प्रोफ्रेसर हरि वासुदेवन और समाजशास्त्र पाठ्यपुस्तक समिति के मुख्य सलाहकार प्रोफ्रेसर योगेंद्र सिंह की विशेष आभारी है। इस पाठ्यपुस्तक के विकास में कई शिक्षकों ने योगदान दिया, इस योगदान को संभव बनाने के लिए हम उनके प्राचायों के आभारी है। हम उन सभी संस्थाओं और संगठनों के प्रति कृतज्ञ हैं जिन्होंने अपने संसाधनों, सामग्री तथा सहयोगियों की मदद लेने में हमें उदारतापूर्वक सहयोग दिया। हम माध्यमिक एवं उच्च शिक्षा विभाग, मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा प्रोफ्रेसर मृणाल मीरी एवं प्रोफ्रेसर जी.पी. देशपांडे की अध्यक्षता में गठित निगरानी समिति (मॉनीटरिंग कमेटी) के सदस्यों को अपना मूल्यवान समय और सहयोग देने के लिए धन्यवाद देते हैं। व्यवस्थागत सुधारों और अपने प्रकाशनों में निरंतर निखार लाने के प्रति समर्पित एन.सी.ई.आर.टी. टिप्पणियों व सुझावों का स्वागत करेगी, जिनसे भावी संशोधनों में मदद ली जा सके।
निदेशक
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान
और प्रशिक्षण परिषद्
नयी दिल्ली
20 दिसंबर 2005
शिक्षकों एवं विद्यार्थियों के लिए दो शब्द
यह पाठ्यपुस्तक समाजशास्त्र के परिचिय हेतु एक आमंत्रण है। यह समाजशास्त्र विषय का विस्तृत एवं बोझिल वर्णन नहीं है, अपितु यह हमें इसका बोध कराती है और साथ ही समाज को समझने एवं अपनी जिंदगी को बेहतर समझने में समाजशास्त्र किस तरह हमारी मदद करता है, उसका ज्ञान प्रदान करती है। यह पाठ्यपुस्तक विद्यार्थियों को समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण, उसकी संकल्पनाओं एवं अनुसंधान के साधनों से परिचित कराती है। यह पाठ्यपुस्तक दर्शाती है कि किस तरह समाजशास्त्र एक विषय की तरह इस तथ्य से संबंधित है कि हममें से प्रत्येक, समाज के सदस्य की तरह, समाज के बारे में सामान्य बौढ़िक विचार और समझ रखता है। समाजशास्त्र ज्ञान के एक निकाय के रूप में समान्य बौढ़िक ज्ञान के निकाय से कैसे अलग है जोकि समाज में अवश्य पाया जाता है? क्या यह अपनी पढ़ति और उपागम के कारण अलग है या यह इसलिए अलग है क्योंकि यह लगातार आलोचनात्मक प्रश्न पूछता है, क्योंकि यह किसी भी विचार को बिना विमर्श के स्वीकार नहीं करता?
हम इस तरह के कई और प्रश्न जोड़ सकते हैं। समाजशास्त्र एक ऐसा विषय है जोकि हमें समाज, जिस तरह से कार्य करता है, वह क्यों और कैसे करता है, इसकी समझ देता है और इसके बारे में प्रश्न पूछने के लिए प्रशिक्षण देता है। इसीलिए समाजशास्त्र में प्रयुक्त शब्द एवं संकल्पनाएँ ज़रूरी हैं क्योंकि वही समाजशास्त्रीय समझ के हमारे साधन हैं।
समाजशास्त्र में आलोचनात्मक दृष्टिकोण के अलावा अन्य विविध दृष्टिकोण और विवादी दृष्टिकोण भी पाए जाते हैं। यह बहुलता इसकी ताकत है। समाजशास्त्र के अंतर्गत समाज के बारे में विभिन्न दृष्टिकोण हैं, उन्हें वाद-विवाद के ज्ञरिए उपयोगी रूप में समझा जा सकता है। वाद-विवाद अकसर एक प्रघटना को बेहतर तरीके से समझने में मदद करता है।
समाजशास्त्र की प्रश्न पूछने और बहुल प्रवृत्ति को ध्यान में रखते हुए यह पाठ्यपुस्तक पाठक के साथ लगातार यह सोचने और दर्शाने में संबढ़ रहती है कि समाज में क्या हो रहा है एवं हमारे साथ एक व्यक्ति के रूप में क्या हो रहा है। इसीलिए पाठ्यपुस्तक में दिए गए क्रियाकलाप पाठ्यसामग्री का एक अभिन्न अंगे हैं। पाठ्यसामग्री एवं क्रियाकलाप मिलकर एक समग्र बनाते हैं। एक के बगैर दूसरे को नहीं समझा जा सकता। समाज के बारे में बनी बनाई जानकारी प्रदान नहीं करना बल्कि समाज को समझने में मदद करना ही इसका उद्देश्य है।
समाज स्वयं बहुल, विविध एवं असमान है। यह पाठ्यपुस्तक इस जटिलता को प्रत्येक अध्याय में दर्शाने का प्रयास करती है। उदाहरण एवं क्रियाकलाप दोनों ही इस जटिलता को अध्याय में लाने का प्रयास करते हैं। अतः क्रियाकलाप पाठ्यसामग्री का आवश्यक भाग है। फिर भी सभी पाठ्यपुस्तकों की तरह यह एक शुरुआत है। इसके साथ ही और बहुत सारी सीखने की रोमांचकारी प्रक्रियाएँ कक्षा में होंगी। विद्यार्थी एवं शिक्षक और बेहतर तरीकों, क्रियाकलापों एवं उदाहरणों के बारे में सोच सकते हैं तथा पाठ्यपुस्तक को और बेहतर बनाने के बारे में सुज्ञाव दे सकते हैं।
पाठ्यपुस्तक निर्माण समिति
अध्यक्ष, सामाजिक विज्ञान पाठ्यपुस्तक सलाहकार समिति
हरि वासुदेवन, प्रोफेसर, इतिहास विभाग, कलकता विश्वविद्यालय, कोलकाता।
मुख्य सलाहकार
योगेंद्र सिंह, प्रोफ्रेसर एमेरिटस, सेंटर फॉर द सोशल सिस्टम, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नयी दिल्ली।
सदस्य
अंजन घोष, फैलो, सेंटर फॉर स्टडीज़ इन सोशल साइंसेज्न, कोलकाता।
अरविंद चौहान, प्रोफेसर, समाजशास्त्र विभाग, बरकतुल्लाह विश्वविद्यालय, भोपाल।
अरशद आलम, लेक्चरर, सेंटर फॉर जबाहरलाल नेहरु स्टडीज्ञ, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नयी दिल्ली।
महेंद्र नारायण कर्ण, प्रोक्फेसर (सेवानिवृत्त), समाजशास्त्र विभाग, नॉर्थ इस्टर्न हिल विश्वविद्यालय, शिलांग।
एस.श्रीनिवास राव, असिस्टेंट प्रोफेसर, ज्ञाकिर हुसैन सेंटर फ्राँर ऐजुकेशनल स्टडीज़, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नयी दिल्ली।
जितेंद्र प्रसाद, प्रोफेसर (सेवानिवृत्त), समाजशास्त्र विभाग, महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक।
दिनेश कुमार शर्मा, प्रोफेसर (सेवानिवृत्त), सामाजिक विज्ञान शिक्षा विभाग, एन.सी.ई.आर.टी., नयी दिल्ली।
देबल सिंह राँय, प्रोफेसर, समाजशास्त्र विभाग, इंदिरा गांधी नेशनल ओपन विश्वविद्यालय, नयी दिल्ली।
पुष्पेश कुमार, डॉक्टोरल फैलो, इस्टीच्यूट ऑफ़ इकोनोमिक ग्रोथ, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली।
मंजू भट्, प्रोफ्रेसर, सामाजिक विज्ञान शिक्षा विभाग, रा.शै.अ.प्र.प., नयी दिल्ली।
मैत्रेयी चौधरी, प्रोफेसर, संटर फ्राँर द सोशल सिस्टम, जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, नयी दिल्ली।
राजीव गुप्ता, ग्रोकेसर (सेवानिवृत्त), समाजशास्त्र विभाग, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर।
राजेश मिश्र, प्रोफेसर, समाजशास्त्र विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ।
शुभांगी वैद्य, असिस्टेंट ढायरेक्टर, रीजनल सर्विस डिविजन, इंदिरा गांधी नेशनल ओपन विश्वविद्यालय, नयी दिल्ली।
सोमेंद्र मोहन पटनायक, ग्रोफेसर, मानवविज्ञान विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली।
सतीश देशपांंडे, प्रोफेसर, समाजशास्त्र विभाग, दिल्ली स्कूल ऑफ्र इकोनोमिक्स, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली।
हिंदी अनुवाद
रामकिशन, अनुवादक (सेवानिवृत्त), इंदिरा गांधी नेशनल ओपन विश्वविद्यालय, नयी दिल्ली। सारिका चंद्रवंशी साजू, एसोसिएट प्रोफेसर, सामाजिक विज्ञान एवं मानविकी शिक्षा विभाग, रा.शै.अ.प्र.प., नयी दिल्ली।
सदस्य समन्वयक
सारिका चंद्रवंशी साजू, एसोसिएट प्रोफेसर, आर. आई. ई. भोपाल, रा.शै.अ.प्र.प., नयी दिल्ली।
आभार
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् इस पुस्तक के निर्माण में सहयोग देने हेतु करूणा चानना, प्रोफ्रेसर (सेवानिवृत्त), ज्ञाकिर हुसैन सेंटर फ्रॉर ऐजुकेशनल स्टडीज्ञ, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नयी दिल्ली; आभा अवस्थी, प्रोफ्रेसर (सेवानिवृत्त), समाजशास्त्र विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ; मधु नागला, प्रोफ्रेसर, समाजशास्त्र विभाग, महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक; दिशा नवानी, लेक्चरर, गार्गी कॉलेज, नयी दिल्ली; विश्वरक्षा, प्रोफ्रेसर, समाजशास्त्र विभाग, जम्मू विश्वविद्यालय, जम्मू; सुर्दशन गुप्ता, प्रिंसिपल, उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, पलोरा, जम्मू; मनदीप चौधरी, पी.जी.टी. (सेवानिवृत्त) (समाजशास्त्र), गुरु हरकिशन पब्लिक स्कूल, नयी दिल्ली; रीटा खन्ना, पी.जी.टी. (समाजशास्त्र), दिल्ली पब्लिक स्कूल, नयी दिल्ली; सीमा बनर्जी, पी.जी.टी. (समाजशास्त्र), लक्ष्मण पब्लिक स्कूल, नयी दिल्ली; मधु शरन, प्रोजेक्ट डायरेक्टर, हैंड इन हैंड, चेन्नई; बलाका डे, प्रोग्राम एसोसिएट, युनाइटेड नेशनल डेवलपमेंट प्रोग्राम, नयी दिल्ली; निहारिका गुप्ता, प्रौलांस एडीटर, नयी दिल्ली और जेसना जयाचंद्रन, शोधकर्ता, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नयी दिल्ली का आभार व्यक्त करती है।
परिषद् सविता सिन्हा, प्रोफ्रेसर एवं अध्यक्ष (सेवानिवृत्त), सामाजिक विज्ञान शिक्षा विभाग का भी उनके सहयोग के लिए आभार व्यक्त करती है।
परिषद् यॉन ब्रीमन तथा पार्थिव शाह का, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी, नयी दिल्ली द्वारा प्रकाशित उनकी पुस्तक वर्किंग इन दा मिल नो मोर से छायाचित्रों का उपयोग करने हेतु आभार व्यक्त करती है। कुछ छायाचित्र पर्यटन विभाग, भारत सरकार, नयी दिल्ली; राष्ट्रीय संग्रहालय, नयी दिल्ली; द टाइम्स ऑफ इंडिया; द हिंदू; आउटलुक और फ्रंटलाइन से लिए गए हैं। परिषद् लेखकों, कॉपीराइट धारकों तथा प्रकाशकों के प्रति उनके द्वारा प्रदत्त संदर्भ सामग्रियों के लिए आभार व्यक्त करती है। परिषद् प्रेस सूचना ब्यूरो, सूचना तथा प्रसारण मंत्रालय, नयी दिल्ली को भी उनके फ्रोटो पुस्तकालय में उपलब्ध चित्रों के उपयोग की अनुमति देने के लिए धन्यवाद देती है। कुछ चित्र जॉन सुरेश कुमार, सायनोडिकल बोर्ड ऑफ्र सोशल सर्विस; जे.जॉन, लेबर फ्राइल, नयी दिल्ली; वी. सुरेश, चेन्नई और आर. सी. दास, केंद्रीय शैक्षिक प्रौद्योगिकी संस्थान, एन.सी.ई.आर.टी., नयी दिल्ली के प्रति उनके योगदान के लिए आभार व्यक्त करती है।
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संपूर्ण पांडुलिपि को जाँचने-परखने तथा उनमें वाँछित परिवर्तनों के लिए सुझाव देने हेतु वंदना आर. सिंह, सलाहकार संपादक को परिषद् धन्यवाद देती है।
इस पुस्तक के चरणबढ़ विकास में सहयोग के लिए परिषद् डी.टी.पी. ऑफरेटर विजय कुमार, सज्जाद हैंदर अंसारी तथा ममता; काँपी एडीटर सुप्रिया गुप्ता तथा राजेश रामजीत राय; पृफ्र रीडर विभोर सिंह तथा श्रेष्ठा; कंप्यूटर स्टेशन इंचार्ज दिनेश कुमार के प्रति भी आभार व्यक्त करती है। हम प्रकाशन विभाग, एन.सी.ई.आर.टी. का भी उनके सहयोग के लिए आभार व्यक्त करते हैं।
विषय-सूची
आमुख iii
शिक्षकों एवं विद्यार्थियों के लिए दो शब्द v
उद्देशिका
हम, भारत के लोग, भारत को एक ¹[संपूर्णी प्रभुत्व-संपन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य] बनाने के लिए, तथा उसके समस्त नागरिकों को :
सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय,
विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म
और उपासना की स्वतंत्रता,
प्रतिष्ठा और अवसर की समता
प्राप्त कराने के लिए,
तथा उन सब में
व्यक्ति की गरिमा और ²[राष्ट्र की एकता
और अखंडता] सुनिश्चित करने वाली बंधुता
बढ़ाने के लिए
दृढ़संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवंबर, 1949 ई. को एतद्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।
